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आज की विशेष कहानी

शब्दों की ताकत: ओह, आह, दर्द और दुख के पीछे हमारे पुरखों की अनुभव|सुविचार

क्या आप सभी में से किसी ने सोचा है कि भाषा सिर्फ बोलने का तरीका नहीं है ? हर शब्द के पीछे एक पूरी कहानी, एक अनुभव, एक एहसास छुपा होता है। हम रोज "ओह", "आह", "दुख", "सुख" जैसे शब्द बोलते हैं, लेकिन रुककर कभी महसूस किया है कि इन शब्दों को सुनते ही हमारा मन क्यों पिघल जाता है ? क्यों विश्व का कोई भी व्यक्ति, चाहे वो किसी भी देश का हो, इन शब्दों को सुनकर संवेदनशील हो जाता है? आज के इस सुविचार में हम इसी बात की गहराई में उतरेंगे। ।। मुख्य सुविचार ।।  ओह,आह,आश्चर्य, दर्द,पीड़ा, सुख और दुख, ऐसे शब्द हैं जिन्हें विश्व का कोई भी व्यक्ति सुनकर संवेदनशील हो सकता है,जैसे ये सारे शब्द, शब्द नहीं स्वयं में ही दर्द हो, आखिर ऐसे शब्दों को बनाने वाले हमारे पुरखे कितने अनुभव शील रहे होंगे ।                                    केदारनाथ ऊर्फ भुवाल,,,,,।  शब्दों के पीछे की कहानी जरा सोचिए, "ओह" शब्द सबसे पहले किसने बोला होगा? शायद हजारों साल पहले कोई पुरखा जंगल में शिकार कर रहा होगा। अचानक पैर में कांटा चुभा,...

कुमुद: संस्कार, ममता और मानवीय रिश्तों का सफर|हिंदी कहानी

कुमुद हिंदी कहानी - रघुवीर कुमार, गौरी और बालक कुमुद का साझीदार परिवार दृश्य। यह इमेज ChatGPT AI से बनाई गई है।

कुमुद: संस्कार, दोस्ती और मानवता की अद्भुत गाथा

लेखक: केदारनाथ भारतीय (उर्फ भुवाल भारतीय)

मनुष्य की पहचान उसके धन, पद या वैभव से नहीं, बल्कि उसके संस्कार, व्यवहार और प्रेम से होती है। कुछ लोग अपने जीवन में ऐसे आदर्श स्थापित कर लेते हैं कि उनका व्यक्तित्व समाज के लिए प्रेरणा बन जाता है। कुमुद भी ऐसा ही छात्र था, मधुर स्वभाव, उच्च विचार और निष्कलंक चरित्र ने पूरे गांव को एक परिवार के सूत्र में बांध देता था। संस्कार, नैतिकता, त्याग और मानवता की कहानी — ' कुमुद '

कुमुद नाम का वह जवान और श्रेष्ठ लड़का,अपने अंतःउर में संस्कारों से परिपूर्ण सभ्यताओं का असीम सागर समेटे हुए था । उसके अधरों से सदा ही पवित्र मिलनसारिता और शिष्ट कुलीनता के अभय रस टपक रहे थे । उसकी मधुर मधुप रस बोलें,उसके  ऊचे ऊचे बिचार, संपूर्ण ग्रामीण जनों में माताओं बहनों तथा पुरुष प्रधान समाज को,एक अद्भुत प्रेम भाईचारे का आश्चर्य में तिरोहित हृदय स्पर्शी संदेश दे रहे थे  ।

वह कुमुद अपने अनुरागी बोल वचनों से जन जन को ऐसे बांध रखा था, जैसे कि वे लंबे लम्बे बांस,अपनी  जड़ों को आपस में एक दूसरों से  लिपटाकर,एकाग्र सूत्र में कस कस एक दूजे को प्रेम पूर्वक बांध रखें हों । वह जिधर भी जाता,उसे उधर ही सभी ग्रामीण जन,अपनी अपनी भाव भंगिमाओं से,कुमुद को अपलक ही  प्रेम पूर्वक वात्सल्य भरी नजरों से प्रेम के वशीभूत हो प्रेम से एकटक निहारने लगते थे ।

वह जब दस वर्ष का था,तब उसकी अनुभव दृष्टि अति बलवान बीस वर्षों के बराबर थी, किन्तु अब उसकी उम्र  इस समय पूरे सताइस वर्ष की हो चुकी  थी, जिसकी अनुभव दृष्टि उसके इस उम्र से कहीं दुगनी थी । वह बचपन से ही पढ़ाई लिखाई में बड़ा ही मेधावी तथा कुशाग्र बुद्धि का था । किन्तु अभी तक वह अपना निर्मल निश्चल और मासूम हृदय लिए अपने बचपन के विषय में भी,कुछ  नहीं जान सका था,वह यह भी नहीं जान पाया था कि आखिर उसके पास भी कभी कोई बचपन था या नहीं या फिर मनुष्य जीवन में कोई बचपन होता भी है या नहीं ।

क्योंकि वह बचपन में ही सायना हो चुका था, उसकी ज्ञानेंद्रियां, उसका मनो मस्तिष्क,उसके अंतः करण के संस्कार सब के सब बचपन में ही शायद पूर्ण विकसित हो चुके थे, इसीलिए तो  वह बचपन में ही सयाना लगने लगा था, उसकी उद्दंडता चंचलता और साथी संघियों के बीच होने वाली हंसी मजाकें सब की सब किसी गहरे सागर में जाकर विलीन हो चुकी थी, जिसकी गहराइयों में अब प्रकृति का एक हंसता खेलता और मुस्कुराता हुआ प्रेमा लब्ध सुकुमार, चतुर्दिक दृष्टिगत हो रहा था ।

रक्षाबंधन के त्योहार पर गांव की कितनी छोटी बड़ी बहन बेटियां, कुमुद की कलाई पर रक्षा सूत्र बांधने के लिए आतुर हुई,कतारें लगाएं हर वर्ष खड़ी रहा करती थी । उस दिन वह कितना चित प्रसन्न रहा करता था, उसके मन बन के मयूर जैसे कितना नृत्य किया करते थे जिसकी कल्पनाएं करना मुश्किल ही नहीं, अपितु असंभव भी था ।

गांव के तमाम संभ्रांत जन इस रक्षा पर्व पर कुमुद की सहायता हेतु हृदय से आह्लादित होकर उसके साथ रहा करते थे । कुमुद के प्रभाव में आकर गांव के कितने उदंड असभ्य और जंगली लड़के सुधर चुके थे ।

जब कभी गांव में आकर कोई बाहरी व्यक्ति उससे पूछता कि आपके परिवार में कितने सदस्य हैं तो कुमुद बड़े ही गर्व से जवाब देता ।

सर पांच हजार, जिसमें डेढ़ हजार से कहीं ज्यादा हमारी बहनें हैं, तीन हजार से भी अत्यधिक हमारे छोटे  बड़े नन्हे मुन्ने भैया भी हैं तथा पांच सौ के लगभग हमारे पूज्यनीय गुरु एवं माता-पिता है जिसे सुनकर लोगों की आंखें आश्चर्य से फटी की फटी रह जाती थी ।

कुमुद के कुटुंब में सौतेली मां गौरी के सिवा और कोई नहीं था ।

अपनी सगी मां रमा का वह इकलौता पुत्र था, कहते हैं जब कुमुद का जन्म हुआ था तब उसकी मां की तबियत  बहुत ही खराब थी, उन्हें प्रसुति का रोग था ।

डॉक्टर पी के श्रीवास्तव, अपनी टीम के साथ उन्हें बचाने के लिए भरसक प्रयास किये थे किन्तु उनकी मां रमा बच नहीं सकी थी, कुमुद के जन्म के तीसरे दिन ही दुनिया से वह अलविदा हो गई थी ।

बिचारे रघुवीर उस दिन बहुत रोए थे जैसे कि उनके ऊपर दुखों का पहाड़ गिर गया हो, रमा की बीमारी में उन्होंने पूरे एक बीघे की जमीन किसी पासी बिरादरी के हाथों औने पौने में बेंच दिए थे, उनकी कुल काश्तकारी सात बीघे की थी, अब उनके पास मात्र छः बीघे की जमीन बची हुई थी जो अपने आप में काफी थी ।

रघुवीर कुमार कुमुद कुमार के बहुत ही प्यारे और भोले भाले पिता थे, जिनके हृदय में लोगों के प्रति मिलन सारिता कूट-कूट के भरी हुई थी ।

किन्तु ऐसे गिरे हुए दिन में उनके नजदीक या दूर-दूर के सगे संबंधी उनसे सदा ही सब दूर-दूर ही रहे, हां रमा के निधन पर वे सब जरूर आये हुए थे ।

कहते हैं जीवन में अपने लोगों की भीड़े अपने दरवाजे पर तीन बार ही इकट्ठी होती है, पहली बार किसी बच्चे की पैदाइश पर दूसरी बार शादी विवाह में और तीसरी बार मृतक घटना पर ।

रघुवीर कुमार, रमा के अचानक काल कवलित हो जाने के बाद कुमुद के लालन पालन की सारी जिम्मेदारी घर की नौकरानी गौरी को सौंप दिए ।

उस समय गौरी भी जवान थी किंतु विधवा थी, उसके मां-बाप बूढ़े हो चले थे घर में एक विकलांग भाई था, जिसका नाम रमेश कुमार था ।

गौरी का ससुराल उसके पति धनवंतरी के निधन के पश्चात ही छूट चुका था ।

खासकर रघुवीर कुमार की वह विधवा गौरी उन्हीं की बिरादरी थी, इससे भी खास बात यह थी कि वह घर के एक-एक रेशे से वाकिफ थी, ऊपर से घर का सारा कामकाज देखना, साथ ही साथ बच्चा कुमुद का ख्याल रखना एक सगी मां से भी बढ़कर था ।

रघुवीर कुमार को तीन महीने बीत जाने के बाद अपने नये परिवार को बसाने में काफी कसमकस झेलना पड़ा था ।

नया परिवार बसायें या नहीं, यदि हम नये परिवार की सृष्टि रचते हैं तो हमारी होने वाली पत्नी सौतेली कहलायेगी, जबकि सौतेली आज के बिगड़े हुए सामाजिक परिवेश में बड़ी ही निष्ठुर होती है, पता नही आगे चलकर, मेरे बेटे कुमुद का ख्याल रखेगी या नहीं, यही तमाम प्रकार की उलझनों में रघुवीर कुमार उलझे हुए थे, कि तभी गौरी ट्रें मैं एक कप चाय ले आकर् रघुवीर कुमार की टेबल पर रखते हुए बोली ।

सर,चाय पी लीजिये, लगता है आप काफी तनाव में हैं ।

न नहीं तो,अरे गौरी जहाँ आप हमारे बच्चे के ऊपर अपनी अनमोल ममता, दिन रात बिना स्वार्थ के लुटा रही हैं, वहाँ पर भला हम तनाव में कैसे रह सकते हैं । आप हो तो हमें अपने गृहस्थ आश्रम की चिंता आखिर क्यों सताएगी ।

फिर भी सर आप अपने विषय में कुछ तो  सोचिये, मुन्ना कुमुद अभी शैशव काल में है, उन्हें संभालने में हमें कम से कम सात वर्ष का समय

देना होगा, तब तक आप यूं ही अकेले कैसे रह सकते हैं, मैं ठहरी आपकी नौकरानी, ऐसी स्थिति में हम आपका साथ ज्यादा समय तक नहीं दे सकती, वैसे भी इतने बड़े घर में हम आपके साथ बिना एक औरत के अकेले कैसे रह सकती हैं, दुनिया हमें ऐसे सेचुएसन में क्या सोचेगी,  इतना ध्यान रहे सर की हम औरतों के पास भी कुछ मान मर्यादाएं होती हैं, इज्जत और आबरू होते हैं यदि किसी भी औरत की अस्मिता पर  एक बार समाज की ऊंगली उठ गई तो समझ लीजिए सर कि वह औरत इस भरी हुई दुनिया में एक जिंदा लास बनकर रह जायेगी,

उसके जीवन की सारी कमाई, उसके जीवन का सारा पुण्य तीर्थ उसकी सारी सतित्वता क्षण मात्र में ही नष्ट भ्रष्ट हो जाएगी, वह एक असहाय अबला सी बनकर सारी जिंदगी खून के आंसू रोती फिरेगी, वैसे भी मैं एक विधवा हूं, खुद से खुद में एक अदृश्य अग्नि परीक्षा की दाह में सदैव ही जलती रहती हूं । अतः अब मैं आपके इस  हवेली में ज्यादा समय तक नहीं रह सकती, यदि मेरे अतिरिक्त कोई दो चार महिलाएं और यहाँ रही होती,तो शायद कुछ और बात होती सर, किंतु ऐसे हालात में अब हम आपके श्री चरणों में ज्यादा समय तक नहीं रह सकती ।

गौरी की करबद्ध करूण वेदनाओं में तिरोहित वाणी सुनते ही रघुवीर कुमार की दोनों आंखें छलछला सी पड़ी थी,वे बड़ी मुश्किल से बोले थे ।

गौरी,आपके सिवा इस दुनिया में मेरा  है ही कौन ,मेरे पिताजी के समय आपकी मां थी जो आपकी ही तरह पूरी ईमानदारी और अपनी कर्तव्य निष्ठा के साथ मेरे इस घर में,एक पारिवारिक सदस्य बनकर रह रही थी, जिनके गुजर जाने के बाद आप हमारे घर आई,मेरे इस घर में आपके आने से अल्प समय में ही सब कुछ स्वर्ग जैसे हो गया,शुरू से ही आप जैसे थी वैसे ही आज भी हैं, कोई बदलाव नहीं । कुलीनता से परिपूर्ण  संस्कार, वही सीधा-साधा सा जीवन, जो सबको प्रिय लगता है । वैसे भी जितना आप मेरे इस घर के विषय में जानती हैं शायद मैं कुछ भी नहीं जानता,जिसका साक्षी स्वयं मेरा भगवान है,गौरी,सच पूछिये तो अब मैं इस दुनिया में  ज्यादा समय तक भटकना भी नहीं चाहता ।

ये ये आप क्या कह रहे हैं सर, आप, आप भटकना नहीं चाहते, मैं कुछ समझी नहीं,आखिर आपका मंतव्य क्या है ।

गौरी रघुवीर कुमार की आंखों में झांकते हुए बड़े आश्चर्य भाव में बोली थी ।

देखो गौरी, मैं चाहता हूं कि मेरे इकलौते बेटे कुमुद का ख्याल जितना आप रख सकोगी,शायद ही कोई दूसरी औरत उनका ख्याल रख सके,इसलिए आप मेरे लिए सर्वश्रेष्ठ एवं सर्वप्रिय हो ।

गौरी मुझे इस दुनिया में अब किसी भी दूसरी औरत की कोई जरूरत नहीं, इसलिए मैं चाहता हूँ कि आप मेरे कुमुद बेटे को एक सगी मां की तरह प्यार दुलार दें, जिससे कि उन्हे यह कभी भी अहसास न हो सके कि आप उनकी दूसरी मां हो । इस तरह से मेरे कुमुद बेटे को अपनी मां मिल जाएगी, और मुझे वह मेरी भोली भाली स्वर्गीय धर्मपत्नी रमा,जिनके रूप छाव† में आप सदा ही खिलकती रहेंगी,आप मुझे मिल जायेगी ।

रघुवीर कुमार की बातें सुनते गौरी चौकाते हुऎ बोली थी ।

यानी की आप मुझसे शादी करना चाहते हैं किंतु,

आपके रिश्तेदार, सगे संबधी और समाज के लोग आपको क्या कहेंगे कभी आपने ऐसा सोचा है, सर मुझे क्षमा कीजिएगा, मैं आपको ऐसे दर दर  झुकाकर लोगों के बीच में नहीं देखना चाहती, आपका स्वाभिमान हमारे लिए एक श्रद्धा है, पूजा और आराधना के समान है ।

पगली,जिस समाज और रिश्तेदारों की बातें कर रही हो ना, वे सब अपने-अपने स्वार्थ में डूबे हुए आडंबरचारी लोग हैं, इनकी हमें किसी भी प्रकार की परवाह नहीं करनी चाहिए, ये सब खुद के लाभ के लिए अपनी दोनों आखों पर स्वार्थ से भरे हुए ऐनक लगाए होते हैं इन्हें अच्छे बुरे का कोई ज्ञान नहीं, इनका तो सिर्फ स्वार्थ सिद्ध होना चाहिए । और हां जब इन्हें अपनी स्वार्थ के मुताबिक लाभ मिलता है तब वे बहुत खुश होते हैं, अपनी बनावटी आशीर्वादो के अमृत बरसाते हैं, किंतु जब उन्हें लाभ की जगह हानि उठानी पड़ती है तब वे खिसिया खिसिया कर एक दूसरे की निंदा करते हैं, उदंडता अभद्रता और अशिष्टता के सोमरस उडेलते हैं तथा अपनी दोनों टांगों से उछाल मार मार कर अहंकार से परिपूर्ण बात संवाद छेड़ते हैं । अतः इनके सारे रिश्ते इनके मतलब के होने चाहिए,ये गिरगिट की तरह पग पग पर अपना रंग बदलने वाले होते हैं इसलिए हमें इनकी कोई भी चिंता या परवाह नहीं करनी चाहिए ।

गौरी मुस्कुराती हुई बल खाकर अपने घुटनों के बल गिरते हुए रघुवीर कुमार के चरणों में समाती चली गई । रघुवीर कुमार पलक झपकते ही गौरी को अपनी बलिष्ठ भुजाओं में भरते हुए उसके मस्तक को चूम लिए थे, गौरी दुनिया से बेखबर हो छुईमुई की तरह मुस्कुराती हुई उनके हृदय केंद्र में ही जाकर चुपचाप स्थान ग्रहण कर ली थी ।

।।समाप्त।।

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कहानी का संदेश

मनुष्य की सबसे बड़ी संपत्ति उसके संस्कार, उसके चरित्र और उसके भिन्न-भिन्न प्रकार होते हैं, सच्चा प्रेम, त्याग और मित्रता किसी भी रिश्ते से संबंध हो सकते हैं। अपने में साधु नहीं, बल्कि इंसान और पन ही हमें महान जीवन बनाते हैं।

कहानी अभी जारी है...

क्या गौरी और रघुवीर कुमार का यह निर्णय समाज स्वीकार करना चाहता है? कुमुद को गौरी की किस प्रकार की मातृभाषा प्राप्त होती है? और कुमुद के जीवन में कौन-से नए मोड़ आने वाले हैं?

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लेखक: केदारनाथ भारतीय (उर्फ भुवाल भारतीय)

हिंदी साहित्य और अर्थशास्त्र पर आधारित कहानियों के रचनाकार, प्रोग्राफिक लेखनी समाज को संस्कार, प्रेम और स्मारक का संदेश संदेश है।

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