लेखक: केदारनाथ भारतीय (भुवाल भारतीय) डॉ. भीमराव अंबेडकर – ज्ञान, समानता और संविधान के महान शिल्पकार। भारत के महान समाज सुधारक, संविधान निर्माता, विधिवेत्ता और करोड़ों लोगों के प्रेरणास्रोत डॉ. भीमराव रामजी अंबेडकर का जीवन संघर्ष, शिक्षा, समानता और आत्मसम्मान का अद्भुत उदाहरण है। प्रस्तुत काव्य-श्रृंखला "डॉ. भीमराव अंबेडकर का संघर्ष" आदरणीय केदारनाथ भारतीय द्वारा रचित एक मौलिक साहित्यिक कृति है। इस श्रृंखला में डॉ. अंबेडकर के जीवन, उनके संघर्ष, विचारों और समाज के प्रति उनके महान योगदान को काव्य के माध्यम से प्रस्तुत किया गया है। आज इस श्रृंखला का प्रथम चरण – "वंदना" आपके समक्ष प्रस्तुत है। आशा है कि यह रचना आपको प्रेरित करेगी तथा डॉ. अंबेडकर के व्यक्तित्व और कृतित्व को और निकट से समझने का अवसर प्रदान करेगी। डॉ भीमराव अंबेडकर का संघर्ष ।। प्रथम चरण ।। ...
आज के इस सुविचार में हम इसी बात की गहराई में उतरेंगे।
।। मुख्य सुविचार ।।
ओह,आह,आश्चर्य, दर्द,पीड़ा, सुख और दुख, ऐसे शब्द हैं जिन्हें विश्व का कोई भी व्यक्ति सुनकर संवेदनशील हो सकता है,जैसे ये सारे शब्द, शब्द नहीं स्वयं में ही दर्द हो, आखिर ऐसे शब्दों को बनाने वाले हमारे पुरखे कितने अनुभव शील रहे होंगे ।
केदारनाथ ऊर्फ भुवाल,,,,,।
शब्दों के पीछे की कहानी
जरा सोचिए, "ओह" शब्द सबसे पहले किसने बोला होगा? शायद हजारों साल पहले कोई पुरखा जंगल में शिकार कर रहा होगा। अचानक पैर में कांटा चुभा, और मुंह से अनायास निकल गया – "ओह!" वो दर्द इतना असली था कि वही ध्वनि शब्द बन गई।
"आह" शब्द लीजिए। ये तब निकलता है जब दर्द के साथ-साथ थोड़ा सुकून भी मिले। जैसे ठंड में पहली बार धूप सेंकने पर मुंह से निकलता है – "आह!" ये राहत की आवाज है। हमारे पुरखों ने जब पहली बार आग जलाई होगी, उसकी गर्मी महसूस करके जरूर "आह" कहा होगा।
"आश्चर्य" शब्द तो खुद ही अपने आप में हैरानी लिए हुए है। आँखें बड़ी, मुंह खुला – "आश्चर्य!" ये वो पल है जब इंसान कुछ नया देखता है। सोचिए, जब आदिमानव ने पहली बार बिजली कड़कते देखी होगी, तो उसके मुंह से यही निकला होगा।
दर्द और पीड़ा में फर्क
हम "दर्द" और "पीड़ा" को एक जैसा समझते हैं, पर इनमें बारीक फर्क है। दर्द शारीरिक होता है – जैसे चोट लगना। पर पीड़ा? वो मन की होती है। किसी अपने के दूर जाने की पीड़ा। हमारे पुरखों ने दोनों को अलग-अलग महसूस किया, तभी दो अलग शब्द बनाए। कितने संवेदनशील रहे होंगे वो लोग।
और "सुख" शब्द? ये तब बना होगा जब दिन भर की मेहनत के बाद पुरखे ने पहली बार पेट भरकर खाना खाया होगा। वो संतुष्टि, वो शांति – उसी का नाम सुख रख दिया।
पुरखों का अनुभव ही हमारी थाती है
आज हम जो भाषा बोलते हैं, वो एक दिन में नहीं बनी। हमारे पुरखों ने लाखों अनुभवों को जीया, सहा, महसूस किया। हर दुख, हर खुशी, हर हैरानी को शब्दों में पिरोया। इसलिए जब हम "दुख" बोलते हैं तो सिर्फ 3 अक्षर नहीं बोलते, हम हजारों साल का अनुभव बोलते हैं।
ये शब्द इसलिए सार्वभौमिक हैं। जापान का व्यक्ति भी "आह" समझता है, अमेरिका का व्यक्ति भी "ओह" पर रुक जाता है। क्योंकि भावनाएं सबकी एक जैसी हैं। पुरखों ने शब्द नहीं बनाए, उन्होंने भावनाओं को आवाज दी।
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| लेखक : केदारनाथ भारतीय |
मेरा अनुभव ये कहता है कि...
मैं केदारनाथ भारतीय उर्फ भुवाल, जब भी किसी को "पीड़ा" शब्द कहते सुनता हूँ, तो मेरे सामने मेरे पिताजी का चेहरा आ जाता है। वो कहते थे – "बेटा, शब्द सम्भाल कर बोलना। किसी का दिल दुखाने वाला शब्द मत बोलना, क्योंकि शब्दों के घाव सबसे गहरे होते हैं।" आज समझ आता है कि वो क्यों कहते थे। क्योंकि शब्दों में जान होती है।
मित्रों शब्दों का सम्मान करिए....
तो दोस्तों, अगली बार जब आपके मुंह से "ओह", "आह", "दुख" या "सुख" निकले, तो एक पल के लिए रुकिएगा। सोचिएगा कि ये शब्द कितने अनुभवों के बाद बने हैं। इन्हें हल्के में मत लीजिए। किसी को दुख देने वाला शब्द मत बोलिए, और सुख देने वाले शब्द बोलने में कंजूसी मत करिए।
क्योंकि आखिर में हम सब शब्दों से ही जुड़े हैं। शब्द ही रिश्ते बनाते हैं, शब्द ही रिश्ते तोड़ते हैं।
मैं केदारनाथ भारतीय आपसे एक सवाल करता हूं?
आपको कौन सा शब्द सबसे ज्यादा छूता है ? "दर्द", "सुख", "आश्चर्य" या कोई और? नीचे कमेंट में जरूर बताइए। मुझे आपके जवाब का इंतजार रहेगा।
अगर ये सुविचार आपके दिल को छुआ हो, तो इसे अपने दोस्तों के साथ शेयर करिए। मिलते हैं अगले सुविचार में।
_— केदारनाथ उर्फ भुवाल_


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