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आज की विशेष कहानी

दुख ही दुख की भाषा समझे कविता | केदारनाथ भारतीय उर्फ भुवाल भारतीय

कविता – दुख ही दुख की भाषा समझे   लेखक – केदारनाथ भारतीय उर्फ भुवाल भारतीय ।। दुख सुख ।।  कविता ।। दुःख तो सुख से न्यारा प्यारा,                प्रेम की गंगा धारा है ।  निश्चल आत्म हितैषी वाणी,                मन का राज दुलारा है । सबको याद है करता निशदिन,                मधुर मधुप रस घोलो से । दुख ही दुख की भाषा समझे,                मिलन करें मधु बोलो से ।।  दुख को देखें सुख जब भैया,                दुख से सुख कुछ दूर हटे ।  हंसी उड़ाए मुंह. बिचकाए,                हेय दृष्टि विष फुट पड़े ।।  सुख हिंसक निष्ठुर अति कामी,                 दयाहीन पाषाण अधम ।  व्यवहार निरंकुश निरा उदंडी,              ...

हमारा गणतंत्र – केदारनाथ भारतीय (भुवाल भारतीय) की हिंदी राष्ट्रकाव्य कविता




हमारा गणतंत्र हिंदी कविता – भारतीय संविधान और गणराज्य पर काव्य, केदारनाथ भारतीय

।।हमारा गणतंत्र।।

संविधान और विचारों को काव्य नमन—केदार नाथ भारतीय 


यह गणतंत सौभाग्य हमारा ।        
 विधि कानून बिचार अगारा ।।

           राष्ट्र आन विधि विरंचि पधारे । 
           नाम भीम विधि विद्या ढारे ।।

यह कविता हमारे संविधान, हमारे गणतंत्र और उन विचारों को नमन है जिन पर भारत खड़ा है। इसे पढ़ते समय शब्दों से अधिक भावों को महसूस करें।

 (लेखक/कवि: केदार नाथ भारतीय उर्फ भुवाल भारतीय)

।। हमारा गणतंत्र ।। 
                     ,,,,, कविता,,,, 

           यह गणतंत सौभाग्य हमारा । 
           विधि कानून बिचार अगारा ।।

           राष्ट्र आन विधि विरंचि पधारे । 
           नाम भीम विधि विद्या ढारे  ।।
 
           लोक विलोक लेख अति टेरी । 
           दंभ नास अरि करत चिरौरी ।।

           महाकाव्य विधि रचना भारी । 
           दीर्घ सराह वर दीन्हा उचारी ।  

  दोहा,,   लेख लेखनी लेखन विधि, प्रकृति का वरदान । 
             आर्यावर्तम भारत खंडेहु, सदा बसेहु विद्वान  ।। 
 चौपाई, ,,
           पंडित नेहरू गांधी शास्त्री । 
           लज्जित हुई दंभ की आधी ।। 

           जल गई मरयादा की बाती । 
           लगी बिहसने मां की छाती  ।। 

           अद्भुत लेख भीम कर लेखा । 
           विशद विभव कानून सरेखा ।।

           धन्य धन्य वह रामजी भीमा । 
          ज्ञानी सुत दिए हिंद के नीमा ।।
 
दोहा,, 
   लिखत भुवाले चंद्र चपल अरु, 
                     रवि भूषण गुण साथ । 
  जगत रचयिता की रचना संघ, 
                     आए दलित घर नाथ ।। 

                       ।। इति श्री ।।


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