90 के दशक का आइकॉनिक खलनायक अब नए अंदाज़ में लौटने को तैयार सिनेमा की दुनिया में कुछ फिल्में सिर्फ फिल्म नहीं होतीं, वे एक दौर बन जाती हैं। Khalnayak ऐसी ही एक फिल्म थी, जिसने 90 के दशक में हिंदी सिनेमा को नया अंदाज़ दिया। जब Sanjay Dutt ने बल्लू के किरदार में पर्दे पर कदम रखा, तो हीरो और विलेन की रेखा धुंधली हो गई। “नायक नहीं, खलनायक हूँ मैं…” सिर्फ गीत नहीं रहा, एक पहचान बन गया। अब खबर है कि Khalnayak Returns के जरिए यह आइकॉनिक कहानी नए दौर में लौट सकती है। और बस यहीं से दर्शकों के बीच उत्साह की लहर दौड़ गई है। क्यों खास है ‘खलनायक रिटर्न्स’? आज जब बॉलीवुड में सीक्वल और फ्रेंचाइज़ी का दौर चल रहा है, Khalnayak Returns सिर्फ एक सीक्वल नहीं, बल्कि एक विरासत की वापसी लगती है। 1993 में आई पहली फिल्म ने अपराध, राजनीति, प्रेम और एक्शन को जिस तरह मिलाया था, वह अपने समय से आगे था। बल्लू कोई साधारण विलेन नहीं था—वह बागी था, खतरनाक था, लेकिन कहीं न कहीं इंसानी भी था। क्या फिर लौटेगा बल्लू? सबसे बड़ा आकर्षण यही है—क्या Sanjay Dutt फिर बल्लू बनेंगे? अगर ऐसा होता है, तो यह सिर...
वर्ली के ट्रैफिक जाम में फंसी एक माँ की बेचैनी ने VIP कल्चर और आम जनता के हक़ पर खड़ी कर दी बड़ी बहस मुंबई की सड़कों पर उस दिन सब कुछ सामान्य था—या कम से कम लोगों को ऐसा ही लग रहा था। सुबह की भागदौड़, हॉर्न की आवाज़ें, ऑफिस जाने की जल्दी और स्कूल से बच्चों को लेने की जिम्मेदारी… हर किसी की अपनी एक कहानी थी। उन्हीं कहानियों में एक कहानी उस महिला की भी थी, जो अपनी कार में बैठी घड़ी पर बार-बार नज़र डाल रही थी। उसका बेटा स्कूल में इंतज़ार कर रहा होगा—यह ख्याल उसके मन में बार-बार आ रहा था। उसने एक्सीलेरेटर पर हल्का दबाव दिया, लेकिन गाड़ी एक इंच भी आगे नहीं बढ़ी। सामने गाड़ियों की लंबी कतार थी, और पीछे से लगातार हॉर्न बज रहे थे। पहले उसने सोचा—शायद कुछ देर की बात होगी। लेकिन कुछ देर धीरे-धीरे आधे घंटे में बदल गई। गर्मी बढ़ रही थी, धैर्य घट रहा था। उसने खिड़की से बाहर झांका—लोग परेशान थे, कोई फोन पर बात कर रहा था, कोई बाइक से निकलने की कोशिश कर रहा था। तभी उसे पता चला कि आगे सड़क पर एक रैली निकली है। भीड़, झंडे और नारे… और उसी भीड़ के बीच कहीं एक काफिला था, जिसमें मंत्री गिरीश महाजन भी ...