क्या आप सभी में से किसी ने सोचा है कि भाषा सिर्फ बोलने का तरीका नहीं है ? हर शब्द के पीछे एक पूरी कहानी, एक अनुभव, एक एहसास छुपा होता है। हम रोज "ओह", "आह", "दुख", "सुख" जैसे शब्द बोलते हैं, लेकिन रुककर कभी महसूस किया है कि इन शब्दों को सुनते ही हमारा मन क्यों पिघल जाता है ? क्यों विश्व का कोई भी व्यक्ति, चाहे वो किसी भी देश का हो, इन शब्दों को सुनकर संवेदनशील हो जाता है? आज के इस सुविचार में हम इसी बात की गहराई में उतरेंगे। ।। मुख्य सुविचार ।। ओह,आह,आश्चर्य, दर्द,पीड़ा, सुख और दुख, ऐसे शब्द हैं जिन्हें विश्व का कोई भी व्यक्ति सुनकर संवेदनशील हो सकता है,जैसे ये सारे शब्द, शब्द नहीं स्वयं में ही दर्द हो, आखिर ऐसे शब्दों को बनाने वाले हमारे पुरखे कितने अनुभव शील रहे होंगे । केदारनाथ ऊर्फ भुवाल,,,,,। शब्दों के पीछे की कहानी जरा सोचिए, "ओह" शब्द सबसे पहले किसने बोला होगा? शायद हजारों साल पहले कोई पुरखा जंगल में शिकार कर रहा होगा। अचानक पैर में कांटा चुभा,...
Exam of the time कड़ी मेहनत, अथक संघर्ष और वर्षों की पढ़ाई के बावजूद गौरव प्रसाद आज भी सफलता की उस सीढ़ी तक नहीं पहुँच पाए थे, जिसकी उम्मीद उन्होंने बचपन से संजो रखी थी। अब उनकी उम्र लगभग 35 वर्ष हो चुकी थी। समय ने उनके सिर के बाल कम कर दिए थे, लेकिन संघर्ष का बोझ अभी भी उनके कंधों पर वैसा ही था। बढ़ती उम्र, परिवार की जिम्मेदारियाँ और बेरोज़गारी ने उनके सपनों को धीरे-धीरे हकीकत की कठोर जमीन पर ला खड़ा किया था। कभी उन्होंने भी सोचा था कि अच्छी शिक्षा उन्हें एक सम्मानजनक नौकरी दिलाएगी। फिर अपना घर होगा, जीवनसाथी होगा, बच्चों की किलकारियाँ होंगी और एक सुकून भरी ज़िंदगी उनका इंतज़ार करेगी। लेकिन वास्तविकता कुछ और ही थी। मेहनत उनकी थी, डिग्रियाँ उनकी थीं, सपने उनके थे—पर अवसर कहीं खो गए थे। जब व्यवस्था आम युवाओं की उम्मीदों से दूर हो जाए, तब सबसे अधिक कीमत उसी गरीब और मेहनतकश वर्ग को चुकानी पड़ती है, जिसके पास सपनों के अलावा कुछ नहीं होता। वर्ष 2040। सोमवार की रात रेलवे स्टेशन पर कंधे पर बैग लटकाए खड़ा गौरव अपने जीवन के सबसे कठिन मोड़ पर था। सामने अनिश्चित भविष्य था और मन में एक ...