वर्ली के ट्रैफिक जाम में फंसी एक माँ की बेचैनी ने VIP कल्चर और आम जनता के हक़ पर खड़ी कर दी बड़ी बहस मुंबई की सड़कों पर उस दिन सब कुछ सामान्य था—या कम से कम लोगों को ऐसा ही लग रहा था। सुबह की भागदौड़, हॉर्न की आवाज़ें, ऑफिस जाने की जल्दी और स्कूल से बच्चों को लेने की जिम्मेदारी… हर किसी की अपनी एक कहानी थी। उन्हीं कहानियों में एक कहानी उस महिला की भी थी, जो अपनी कार में बैठी घड़ी पर बार-बार नज़र डाल रही थी। उसका बेटा स्कूल में इंतज़ार कर रहा होगा—यह ख्याल उसके मन में बार-बार आ रहा था। उसने एक्सीलेरेटर पर हल्का दबाव दिया, लेकिन गाड़ी एक इंच भी आगे नहीं बढ़ी। सामने गाड़ियों की लंबी कतार थी, और पीछे से लगातार हॉर्न बज रहे थे। पहले उसने सोचा—शायद कुछ देर की बात होगी। लेकिन कुछ देर धीरे-धीरे आधे घंटे में बदल गई। गर्मी बढ़ रही थी, धैर्य घट रहा था। उसने खिड़की से बाहर झांका—लोग परेशान थे, कोई फोन पर बात कर रहा था, कोई बाइक से निकलने की कोशिश कर रहा था। तभी उसे पता चला कि आगे सड़क पर एक रैली निकली है। भीड़, झंडे और नारे… और उसी भीड़ के बीच कहीं एक काफिला था, जिसमें मंत्री गिरीश महाजन भी ...
इस दुनिया में हर कोई कुछ पाने के लिए भाग रहा है, लेकिन अंत में सब कुछ खो देता है। शहर की रात अजीब होती है। दूर से देखो तो रोशनी, पास जाओ तो अंधेरा। उसी अंधेरे में आरुष खड़ा था, हाथ में एक पुरानी चिट्ठी लिए — जिसकी आखिरी लाइन थी, “अगर सच जानना है, तो मुझे ढूंढो… लेकिन शायद तब तक बहुत देर हो चुकी होगी — मीरा।” मीरा… वही लड़की जिसने कभी उसे सिखाया था कि प्यार सबसे बड़ी दौलत है। और वही लड़की एक दिन अचानक गायब हो गई थी। आरुष ने उस चिट्ठी को कई बार पढ़ा था, लेकिन आज उसकी आँखों में कुछ और था — डर, बेचैनी और एक अजीब सा शक। क्योंकि शहर में पिछले कुछ महीनों से अजीब घटनाएँ हो रही थीं। लोग अचानक गायब हो जाते थे, कुछ लाशें मिलती थीं, और कुछ का तो कोई नामोनिशान भी नहीं मिलता था। सब कुछ जुड़ा हुआ लग रहा था… और अब मीरा भी उसी कहानी का हिस्सा बन चुकी थी। वो चिट्ठी उसे शहर के एक पुराने इलाके में ले आई, जहाँ इमारतें खामोश थीं और गलियाँ जैसे किसी राज को छुपाए बैठी थीं। अंदर जाते ही उसे एक हल्की सी बदबू महसूस हुई — जैसे सड़ते हुए सच की। एक दरवाजा आधा खुला था। उसने उसे धक्का दिया। अंदर जो था, वो किसी बुरे स...