मानव से महामानव (दोहावली हिंदी कविता) मानव से महामानव ध्रुव, कोटि कोटि बंदन । जाति अछूत के उद्धारक, भारत भूमि के चंदन ।। युग युग में बिरले ही आते, आपके जैसे प्राण । शिक्षा की डिग्री भी नर्वस, जाति सवर्ण में त्राण ।। संविधान के प्राण विधाता, ब्रह्म निकेतन चाँद । आप धरा पर यदि ना आते, न जाता मनुवाद ।। खत्म न होती जाति प्रथा, व्यथा गुलामी टीस । खत्म ना होती बंधुवा श्रम, मार बदन पग शीश ।। नमन...
।।आज के सुविचार— संकोची।। मनुष्य प्रायः अपने चिर परिचितों, कुटुंब कबीलो एवं आगंतुकों से, झुक झुक कर अभिवादन करता है। संस्कार शिष्टअचर एवं सभ्यता दिखाता है, संकोची स्वभाव होने के कारण वह कभी-कभी अपनी जिज्ञासा पूर्ण अंतरात्मा की बातें भी नहीं कह पाता है किंतु वह अपने भगवान से अपने पारब्रह्म परमेश्वर से, अपने इष्ट विधाता से, लेस मात्रा भी संकोच नहीं करता, यहां तक की वह अपना अदब लिहाज और शिष्टाचार भुलाकर बड़े ही निडरता पूर्वक उनसे अपने हृदय की एक एक बात प्रार्थना बनाकर कह देता है। जिसे ईश्वर मंद मंद मुस्कुराते हुए उसकी हर एक बात स्वीकार कर लेते हैं । हमारे ईश्वर कितने सुंदर हैं कितने अच्छे हैं और कितने ही समर्पित स्वभाव के हैं एवं कितने प्रिय है आप कमेंट में जरूर बताइएगा केदारनाथ भारतीय अगर आपको यह “आज का सुविचार – संकोची” पसंद आया हो ❤️ तो कृपया इसे शेयर करें, Comment 💬 में अपनी राय जरूर दें,और लेखक का हौसला बढ़ाए। ऐसे ही और प्रेरणादायक विचार पढ़ने के लिए हमारे ब्लॉग Kedar Ki Kalam को Follow करें। ?...