कविता – दुख ही दुख की भाषा समझे लेखक – केदारनाथ भारतीय उर्फ भुवाल भारतीय ।। दुख सुख ।। कविता ।। दुःख तो सुख से न्यारा प्यारा, प्रेम की गंगा धारा है । निश्चल आत्म हितैषी वाणी, मन का राज दुलारा है । सबको याद है करता निशदिन, मधुर मधुप रस घोलो से । दुख ही दुख की भाषा समझे, मिलन करें मधु बोलो से ।। दुख को देखें सुख जब भैया, दुख से सुख कुछ दूर हटे । हंसी उड़ाए मुंह. बिचकाए, हेय दृष्टि विष फुट पड़े ।। सुख हिंसक निष्ठुर अति कामी, दयाहीन पाषाण अधम । व्यवहार निरंकुश निरा उदंडी, ...
आप जिस कहानी को पढ़ रहे हैं, उसके लेखक हैं — केदार नाथ भारतीय, प्रयागराज (उत्तर प्रदेश) से।
कहानियाँ जो दिल से निकलती हैं, उन्हें सुरक्षित रखना हमारी ज़िम्मेदारी है।
Stories that come from the heart, protecting them is our responsibility.
यह कहानी पूर्णतः काल्पनिक है, इसका उद्देश्य केवल साहित्यिक मनोरंजन और मानवीय भावनाओं को प्रस्तुत करना है।
पिछले भाग में अपने देखा कि.....
राघव फाइव स्टार होटल में बैठा न्यूज़ पेपर पढ़ रहा था।
अचानक एक खबर ने उसे हिला दिया — उसके गांव में भीषण भूकंप आया था।
वह घबराकर तुरंत गांव की ओर भागा।
जब राघव गांव पहुंचा तो, उसे उसका गांव ही नहीं मिल रहा था , अब आगे की कहानी ......
राघव और दिव्य शक्ति की एक अलौकिक संवाद की कहानी—विचित्र दुनिया
राघव भागते-भागते आखिर, अपने गांव अकोढापुर पहुंच ही गया, वैसे जनसंख्या की दृष्टि से यह गाँव बहुत बड़ा था। क्योकि उस गाँव मे लगभग 5,000 से कही ज्यादा वोटर थे। दिन-रात वहाँ चहल- पहल हुआ करता था। उसके दादा कुंज बिहारी राय जी कभी इस गाँव के सरपंच हुआ करते थे।
वे बहुत ही ईमानदार कर्तव्य निस्ट और स्वाभिमानी ब्यक्ति थे। वे दुसरो की सेवा मे ही अपना जीवन सार्थक समझते थे। दादी के गुजरे हुए 10 वर्ष से कही ज्यादा समय हो गया था। तब से वे अपने बाल बच्चों जैसा गाँव के सभी लोगो से प्यार दुलार किया करते थे।
राघव उस समय मात्र तीन वर्ष का था। किन्तु दादा का प्यार दुलार आज भी नही भुला था। बचपन मे जब भी कोई उसे भला बुरा कहता या मारने के लिए खदेरता, वह भाग कर कही और नहीं बल्कि, दौड़ते हुए दादा के गोद में जाकर बैठ जाता था।
और फिर सुबक- सुबक कर शिकायत करता कि पापा ने मुझे मारा है। तब तो समझों पापा की खैर नही दादा वही से चिल्ला पड़ते थे, कहते क्यों रे नरेशवा--! मेरे नाती को क्यों मार दिया! मेरा नाती सूरज चाॅद हैं! इसे मामूली क्यों समझता है! यही लड़का आगे चलकर किसी सरकारी दफ्तर में साहब बनेगा! तब देख लेना मेरे नाती को दुनिया सलाम करेगी सलाम!
राम नरेश राय, राघव के पापा का नाम था। घर के अंदर बैठे हुए राम नरेश राय अपने पापा की बात सुन रहे थे। तब तक दादा की आवाज़ फिर गुर्राई, नरेशवा जहां कहीं हो जल्दी आ। नरेश राय पापा की आवाज सुनकर बड़े अदप, के साथ वहाँ हाजिर होते हैं।
ममता और अनुशासन के बीच राघव
क...क्या हैं! पापा जी मुझे क्यों बुलाये। क्यो मारते हो इस बच्चे को यह मेरा नाती हैं, कोई ऐरा - गैरा नहीं। दादा कुंज बिहारी ने कहा --! नरेश तुम्हे क्या मालूम जब तुम छोटे से थे, तो हमने कभी भी दुभ की सुटकनी से नहीं मारा, और, और तुम हो कि जबय नाही तबय मेरे नाती को मार देते हो!
प...पापा पापा! राम नरेश राय की आवाज मे थोड़ा रूखापन था। यह लड़का स्कूल नहीं जाता, इतना बड़ा हो गया हैं। अब तो इसे स्कूल जाना चाहिए न! राम नरेश की बात सुनकर दादा थोड़ा नरभस होकर बोले तो ठीक है बेटा! इसमें तुम कसुरवार नहीं हो, कसुरवार तो मेरा नाती हैं। अब तुम जाओ इसे हम समझाते हैं! हा पापा आप इसे जरूर समझा दीजिये, नहीं तो--नहीं तो आप के दिये हुए सुबह - शाम के आर्शिदवादो का क्या होगा ! बिना शिक्षा लिए उसे तो झूठा बना देगा!
राम नरेश राय इतना कहते हुए एक झटके के साथ आगे बढ़ गए। तब दादा अपने नाती राघव को बड़े लाड़- प्यार से समझाने लगे। राघव के सर पर हाथ फिराते हुए दादा ने कहा! अब तुम देखते ही देखते सात वर्ष के हो गये हों! तुम्हारी उम्र अब पढ़ने की योग्य हो गई है, अब स्कूल जाया करो! नहीं तो तुम्हे कोई मारेगा तो मै देखता ही रह जाऊंगा, कुछ बोल नहीं पाऊंगा। राघव के सर पर हाथ फिराते हुए दादा ने पूछा बेटा राघव मेरी बात सुन रहे हों न!
हा दादा सुन रहा हूँ, राघव ने तबाक से बोला, हा सुन रहा हूँ। आप आगे बताये । मैं तुझपर बलिहार जाऊ मेरे नाती, मेरे लाल मेरे प्यारे बेटा! दादा उत्कंठित स्वर में बोले। बेटा। अच्छा जीवन जीने के लिए शिक्षा बहुत जरूरी होता हैं। शिक्षा ही एक ऐशा अमूल रत्न हैं जिसे कोई चुरा नहीं सकता। कोई इसका बटवारा नहीं कर सकता, और न कोई इसे तेजधार हथियार से काट सकता हैं।
शिक्षा के आगे संसार की सारी ताक़तें नतमस्तक हैं — विचित्र दुनिया (उपन्यास)
बेटे! शिक्षा से दुनिया झुक जाती हैं, जिसका वंदन- अभिनंदन सारा जगत करता है। शिक्षा के आगे संसार के सारे उद्योग बौने साबित हो जाते हैं। शिक्षा हैं तो दुनिया में सर्वश्रेष्ट् नाता है। अन्यथा सारा रिस्ता - नाता बिमाता के समान हो जाता हैं। इसलिए शिक्षा बहुत जरूरी है,
अत: अब कल से स्कूल जाओगे की नहीं। दादा ने बड़े स्नेह से पूछा था। हा दादा अब तो स्कूल रोज जाऊंग! राघव ने तुतलाते हुए कहा था। तब दादा ने उसे दस रुपये की एक नोट थीमा दिये थे। राघव नोट पाते ही चहक सा उठा । उछलते - कुदते हुए बड़ी तेजी के साथ दुकान पर चला गया। दादा मुस्कुराते हुए राघव को हिरणो की भाती उछलते - कुदते देखकर बड़े प्रसन्न हुए थे।
किन्तु ये क्या राघव पुन: उछलते- कुदते हुए दोनों हाथ पीछे करके दादा के पास चला आया। फिर मुस्कुराते हुए दादा से बोला! दादा — दादा देखो हम आ गये। हम दुकान से कुछ खरीद कर लाये हैं, हम उसे आपको दिखाना चाहते हैं, लेकिन एक सर्त हैं आप अपनी दोनों आँखे बंद कर लीजिये।
जब मैं कहूंगा तभी आप अपनी आँखे खोलियेगा! दादा कुंज बिहारी जी मुस्कुराते हुए बोले थे। अच्छा ये बात है, चलो भाई हम अपनी दोनों आँखे बंद कर लेते हैं, अब बोलो क्या लाये हो। राघव ने कहा दादा अब आप अपनी आँखे खोल दीजिये, देखिये हम क्या लाये हैं।
ठीक है, दादा ने अपनी दोनों आँखे तपाक से खोल दी। तब वह नन्हा राघव हँसते हुए दादा से बोला था। दादा जी आप तो मेरे बड़े आज्ञाकारी निकले जो मैं कहता हूँ , वही आप करते हैं। देखिये न हम दुकान से क्या लाये हैं। दादा ने कहा क्या लाये हो बेटा ? अब तो दिखाओ।
राघव ने अपने दोनों हाथ आगे की तरफ करके दादा की हथेली पर समान रख देता हैं। दादा समान देखते ही उछल पड़े। अरे ये क्या? काॅपी - कलम और पेंसिल! इसे आप क्यो खरीद लाये, इसे तो हमें खरीदना चाहिए था।
आपके पापा 'राम नरेश राय' को खरीदना चाहिए था। मैंने तो पैसा दिया था, कुछ खाने पीने के लिए। दादा, दादा आप अब भी मेरी बात नहीं समझे, होनहार बच्चो का लक्षण यही होना चाहिए की घर से पाया हुआ पैसा खाने पीने मे न खर्च करे बल्कि उसे शिक्षा - दीक्षा पर खर्च करे।
अब तो दादा को गुजरे हुए कालांतर बित गये।
किन्तु उनकी मीठी- मीठी यादे, मधुर आवाजे आज भी राघव से जुड़ी हुई थी। वह दुःख मे हों या सुख मे, अपने माता-पिता से कहीं ज्यादा, वह अपने दादा को याद किया करता था। राघव उस दिन बहुत रोया था, जब उसके दादा इस नश्वर संसार से विदा हो गये थे।
राघव उनके सीने से लग कर, सर पटक-पटक कर रोया था। उसके आंशु रुकने के नाम ही नहीं ले रहे थे। किन्तु आज वह राघव, अपने ही गाँव मे खड़ा होकर अपना गाँव ढूंढ रहा था। यह कितने आश्चर्य की बात थी। कि वह अकेला-तन्हा उस काले स्याह घोर अंधेरे मे इधर से उधर भटकने पे मजबूर था।
वह जिधर भी जाता उसे घोर सन्नाटा ही दिखाई पड़ता था। और जिधर भी देखता समसान घाट जैसी विरानीयां पाता। साँय-साँय, भाय-भाय करती हुई वह भयानक रात अत्यंत ठीक दुःख-दाई और डरावानी लग रही थी। इतनी घनी आबादी वाला यह गाँव चारो तरफ से लापता था।
जिधर भी देखो उधर ही कच्चे-पक्के मकानों का डहा हुआ मलबा, पूर्ण भाग्यनावशेष का क्रूप संसार, बड़े- बड़े आकर- प्रकार के बलवान वृक्ष , सब के सब वहा उखड़े हुए, जमीदोज थे। राघव हतप्रभ खड़ा-खड़ा अचानक बडबड़ाया। शायद यह मेरा गाँव नहीं हैं जरूर मैं भुला - भटका हू। एक मैं, म मेरा गाँव तो बहुत बड़ा गाँव था। यहाँ तो एक भी घर मकान नहीं दिखाई पड़ रहे हैं, जरूर मैं भुला - भटका यहाँ पहुँचा हू।
यादों का हमला और डर की शुरुआत — विचित्र दुनिया (उपन्यास)
तभी उसकी आत्मा ने उसे झकझोरा! राघव ये तेरा ही गाँव एकोढापुर हैं तु भूल गया, जहा एक भी घर - मकान नही रहे और ना ही एक भी मानव कुल वंशज। "राघव घबराया" नहीं--- नहीं ऐसा नहीं हो सकता अचानक उसके हृदय की गति बढ़ने लगी! तभी कुछ दूरी पर उसे एक बोर्ड दिखाई पडा।
वह दौड़ते हुए उस बोर्ड के सनिकट पहुँचा। अरे यह तो बोर्ड मेरे दोस्त दिवाकर का हैं। वर्षो पहले यहाँ कोचिंग सेंटर चला रख्खा था। बोर्ड मे लिखा था, दिवाकर कोचिंग सेंटर अकोढापुर। हे भगवान अब मै क्या करूँ, मेरा घर मकान कहा हैं। मेरे बीबी- बच्चे और माँ- बाप कहा हैं। क्या--! क्या--! वो भी इस भयानक त्रासदी के भेंट चढ़ गये।
न --नहीं! ऐसा नहीं हो सकता। अरे हा मुझे याद आया, म, म -- मेरा घर इसी कोचिंग सेंटर के पीछे ही तो था। वह रोते हुए, चिखते- चिल्लाते कोचिंग सेंटर के पीछे पहुँचा। मगर ये क्या...? वहा अब कोई मकान नही, सब के सब गिरे पड़े भयानक खंडहर मे तब्ददिल हो चुके थे।
वह ऐसा दृष्य देखते ही जोर- जोर से रोने लगा! तभी पलक झपकते ही उसे किसी मानव के पद- चाप सुनाई पड़े। वह तुरंत पीछे की तरफ मुड़कर ततक्षण उसके मार्ग की दिशा मे आकर खड़ा हो गया। वह पदचाप अब धीरे- धीरे तेज हो गये थे। राघव सतर्क हो गया, उससे मिलने के लिए वह भय- मिश्रित आकुल- ब्याकुल था। अचानक वह सफेदपोश उसे दिखाई पड़ा। आश्चर्य था कि उस सफेद पोश मानव के चारो तरफ अजीब सा प्रकाश कुंज था।
सफेद पोश और राघव — आधी रात का सामना
राघव उसके ठीक सामने खड़े-खड़े अपने दोनों हाथ फैला दिये। सफेद पोश दूर से ही चिल्लाया-- हट जाओ! हट जाओ! मेरे सामने से हट जाओ! मुझे जाने दो! मुझे जाने दो! मुझे बिलकुल ना रोको! तुझसे बात करने के लिए, मेरे पास समय नही है। राघव भी विनम्र भाव से चिल्लाया, नही- नहीं! मैं आपको आगे नही जाने दूंगा। आप अपना परिचय दे कर ही जाए। आखिर आप इतनी रात गये कहा जा रहे हो?
नजदीक आकर वह सफेद पोश अपनी चाल में शिथिलता लाते हुए, धीरे से, किन्तु जल्दी से बोला! हम माया से दूर बहुत दूर जा रहे हैं। माया मेरी पीछा किये हुए हैं इसीलिए उससे दूर भागे जा रहे हैं---- हमारे पास समय नही है। अत: मेरा मार्ग छोड़ो! नहीं तो वह माया यहाँ आ जायेगी।
आखिर कौन सी माया? राघव ने कहा, कैसी, माया? कहा की माया? राघव ने उस सफेद पोस पथिक से काफी नजदीक होकर पूछा था। वह सफेद पोस राघव की ऐसी निडरता - निकटता देखकर चौकते हुए, बड़े सहज भाव मे बोला!
बच्चे तुम बड़े निडर हो डरते नहीं सुनो, पृथवी लोक की संसारीक माया! मेरा और तेरा का माया! जीवन और मरण का माया, इससे हम ऊब गये हैं इसलिए तुम मुझे मत रोको, मुझे जाने दो, बहुत दूर जाने दो! इतना दूर की माया की परछाई भी वहा तक न पहुँच पाए।
इस माया से दूर भाग कर जायेंगे कहा! माया तो कड- कड मे निवासित हैं! सारी पृथ्वी माया से आक्षदित हैं! यह सकल ब्रहमांड भी माया के श्रृंगार से आहलादित हैं। वैसे यहाँ का हर एक प्राणी माया बंधन से जकड़ा हुआ है! राघव ने कहा - हे सफेद पोस मानव आप भी स्वयम् माया वस्र धारण किये हों। सुना हु यह शरीर ही माया की सबसे बड़ी जड़ है। इसे कैसे त्यागेंगे! राघव ने पूर्ण विवेकिता का प्रदर्शन कर उसे चौका दिया।
वह बड़ी तेज से तिलमिलाया! यदि यह शरीर माया की जड़ हैं, तो मैं इसका हवन- यज्ञ बनाकर, अपने बस मे कर लूंगा।
इसे तपा-तपाकर बैकुंठ पत के श्रीचरणो का पवित्र रज बना दूंगा! तब माया मेरे संमुख आ कर अपने घुटने टेकेगी। और मुझसे क्षमा मागते हुए कहेगी कि मै सब पे विजय पा गई किन्तु आप पर नहीं! मै आपसे हार गई! हा ! हा! हा!
आप कौन है? राघव ने बड़ी उत्सुकता से पूछा! अभी तक आपने अपना परिचय नहीं दिया। 'बच्चे मै देव- दूत हू' सारे जगत का सदा ही भ्रमड किया करता हू। वैसे मेरे लाल तुम्हारे योग्य यह अस्थान ठीक नहीं। मैं तो अपने लोक जा रहा हूँ, किन्तु यहाँ से जितना शीघ्र हो सके तुम यह स्थान छोड़ दो, ईश्वर तुम्हारा कल्याण करे।
इतना कहते हुए, वह सफेदपोस आगे बढ़ गया। राघव अपनी फटी - फटी आँखों से उसे तब तक निहारता रहा जब तक वह दिखाई पडा। इससे पहले वह कुछ समझ पाता, उसके ठीक पीछे मानव पद चाप पुन: सुनाई पड़ा, वह बड़ी तेजी के साथ चौकते हुए पीछे की ओर मुडा। कहीं दूर- दूर से आवाजे आ रही थी।
राघव का सवाल, पथिक की बेचैनी
हटो- हटो, भागो- भागो! मुझे मत रोकना! हम बहुत दूर की यात्री हैं, हम बहुत दूर जायेंगे! मेरे पास बिल्कुल भी समय नहीं हैं। राघव बिना इक पल गवाए।, तट क्षण अपने दोनों हाथ उसके मार्ग की दिशा में फैला दिये।
वह अब भी चिल्लाये जा रहा है। मेरी सहजता और विनम्रता के नजायद फायदा मत उठाइये, हट जाइये मेरे रास्ते से हम नहीं रुकना चाहते। क्यो नहीं रुकना चाहते? आप से प्राथना हैं बस पल दो पल के लिए मेरे पास आकर रुक जाए!
राघव ने चिल्लाकर कहा। पथिक धीरे -धीरे राघव के समीप आकर रुकते हुए बोला, क्यो रोक लिया मुझे? मैं पहले से ही चिल्ला रहा था कि मुझे मत रोको मेरे पास एक क्षण भी समय नही। राघव ने कहा, हे भद्र इस दुरूह और दुरुगम मार्ग से अकेले इतनी रात गये आप कहा जा रहे हैं..?
क्या आपको भय नही लगता..? मुझे अपने प्रश्नों मे उलझाओ नहीं। पथिक ने कहा मुझे जाने दो! मृत्यु मेरा पीछा किये हुए, अभी दौड़ी यहाँ आती ही होगी।
वह पथिक पीतांबर पहने हुए गिड़गिडाया। मैं मृत्यु से बहुत दूर भाग जाना चाहता हूँ। मैं रूकूँगा नही, म मुझे जाने दो। मृत्यु मुझे यहाँ वहा चारो दिशाओं मे आवाज़ देकर ललकार रही हैं। इसलिए मैं रूकूँगा नहीं, मुझे जाने दो। मैं बिना मृत्यु के जीना चाहता हूँ, आजाद होकर स्वछंद होकर जीवन बिताना चाहता हु। मैं मृत्यु से इतना दूर चला जाना चाहता हूँ कि जहाँ हजार- हजार जन्म लेने के बाद भी वह मेरे निकट न पहुँच सके इसलिए जाने दो, रोको मत।
उसके स्वर मे अत्यंत ही घबराहट व पीड़ा थी। मृत्यु से ऐसे भागा नहीं जाता! राघव ने कहा, आखिर आप उससे भाग कर जायेंगे कहा। मृत्यु तो अटल सत्य है, उसका समय सीमा सुनिश्चित होता है। चाहे वह जीवन किसी प्राणी का हो। मेरा कहा माने तो आप यहाँ से लौट जाए। तनाव रहित होकर अपने धाम जाकर सुख- शांति से विश्राम करे।
चुप रहो....! चुप रहो मुझे समझाने की चेस्टा भी मत करना। मैं जा रहा हूँ। ईश्वर तुम्हारा कल्याण करे! जितना शीघ्र हो सके तुम यहाँ से चले जाओ। वह एक झटके के साथ आगे बढ़ गया। राघव उसे जाते हुए देखता रहा...................
यह कहानी पूर्णतः काल्पनिक है, इसका उद्देश्य केवल साहित्यिक मनोरंजन और मानवीय भावनाओं को प्रस्तुत करना है।
लेखक: केदार नाथ भारतीय उर्फ भुवाल भारतीय (प्रयागराज)
ब्लॉगर | कहानीकार
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