कविता – दुख ही दुख की भाषा समझे लेखक – केदारनाथ भारतीय उर्फ भुवाल भारतीय ।। दुख सुख ।। कविता ।। दुःख तो सुख से न्यारा प्यारा, प्रेम की गंगा धारा है । निश्चल आत्म हितैषी वाणी, मन का राज दुलारा है । सबको याद है करता निशदिन, मधुर मधुप रस घोलो से । दुख ही दुख की भाषा समझे, मिलन करें मधु बोलो से ।। दुख को देखें सुख जब भैया, दुख से सुख कुछ दूर हटे । हंसी उड़ाए मुंह. बिचकाए, हेय दृष्टि विष फुट पड़े ।। सुख हिंसक निष्ठुर अति कामी, दयाहीन पाषाण अधम । व्यवहार निरंकुश निरा उदंडी, ...
प्रिय पाठको, मैं नागेंद्र भारती, आप सभी का इस नई कहानी “दोस्ती” में स्वागत करता हूँ। यह कहानी सिर्फ शब्दों का संग्रह नहीं, बल्कि उन पलों की सच्चाई है जहाँ एक अजनबी,
धीरे-धीरे दिल का सबसे करीबी बन जाता है।
आइए, इस एहसास की यात्रा शुरू करें… ( लेखक: केदार नाथ भारतीय उर्फ भुवाल भारतीय, उत्तर प्रदेश, प्रयागराज )
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| जहाँ दोस्ती स्मृति बन जाती है, और यात्रा अकेली। |
।। दोस्ती ।।
सन् 2025, दिन मंगलवार, दिसंबर माह की 16 तारीख,,,,,,,।
बड़ा ही विचित्र,बड़ा ही भयावह, विशद बर्फवारी का तांडव, क्षितिज पर कुहरों का श्वेत मेघ मंडल, हिम अवतरण । मंद मंद गति के साथ बहती हुई हवाओं के संग,भीषण हिमपात की अकूत ओलावृष्टि । नस नस में रक्त वाहिनियों को एक ही क्षण में जमा देने वाली,महा भयानक हिमपात । व्योम मंडल के रविदंत रविभूषण अरुणोदय की,आज स्वर्णिम आभाओं का महा परिवर्तित कांतिहीन छटा ।
ईश्वर जाने कि आज वे शून्य के किस कोने से रेंगते हुए शाम के छह बजा दिए थे । किंतु अभी-अभी यह विदित हुआ है कि ट्रेन ने अपनी मध्यम गति के साथ, हावड़ा ब्रिज को बड़े ही उत्साह पूर्वक,अपनी कर्तव्य परायणता से लब्ध हो,बड़े ही आराम से ट्रेन का संतुलन बनाए हुए उसे पार कर लिया है । राम मनोहर पंढरपुरी ट्रेन से उतारकर जैसे ही प्लेटफार्म नंबर 4 से होते हुए बाहर आए थे, वैसे ही उन्हें हिमपात में नहाई हुई हवाओं के थपेड़ों ने एक जोरदार टक्कर मारी, जिसके कारण वे थर थर कांपते हुए घबरा से गए, किंतु अपने आप को वे संभालने में एक पल की भी देरी नहीं किये थे ।
वैसे भी पूस का महीना होने के कारण,घर से निकलते समय वे पूरी तरह से सजगता के साथ तैयारी करके, इस विशद यात्रा पर निकले थे, उन्होंने पहले से ही ठंड की अति से बचने के लिए,कई बड़े जतन किए थे, वे अपनी काले रंग की गरम कोट, घर से ही चलते समय पहन रखे थे । पैर में जूते व मोजे, वे कब के ठूसें हुए थे । सर से लेकर गर्दन तक ढकने वाली एक बड़ी सी टोपी भी पहन रखे थे ।
जिसे जल्दी जल्दी वे अपनी दोनों हथेलियों से, खींच–खींच कर और भी चुस्त दुरुस्त करने लगे थे । वे रात्रि के लगभग 9 या 10 बजे तक अपनी बहन सुनैना के घर पहुंच जाना चाहते थे, जिसके घर की दूरी स्टेशन से 20 किलोमीटर से कम की नहीं थी, किंतु इतनी रात्रि में,पैदल ही वो इस प्रकार की वीभत्स विशद यात्रा,अकेले कैसे कर सकते थे ।
इसके पश्चात भी उनके सामने और भी कई प्रकार की दिक्कतें थी,जैसे कि उनका बर्फीले मौसम में रात्रि के समय इस प्रकार से सुनसान पथ पर अकेले होकर इन झाड़ी झंख वन्य क्षेत्रों से दुर्गम राह होते हुए गुजरना । जंगली जानवरों,जीव जंतुओं एवं आक्रामक हिंसक पशुओं का खतरा, हिमपात मिश्रित कुहरो का,भयानक झंझावात भरा तांडव, वहां की संपूर्ण प्रकृति का हरित कलेवर,कुहासों और ओलावृष्टि की मोटी मोटी परतों से आहत होकर उसी में सिमटे रहना ।
लोग एक दूसरों को भी नजदीक से नहीं देख पा रहे थे, ठंड भरी हवाएं हाड़ माँस को गलाने के लिए आतुर हो चली थी । ऐसे में मोटर गाड़ियों के आने जाने पर,जिला प्रशासन ने भी रोक लगा दी थी । फिर भी राम मनोहर पंढरपुरी जी,पीछे मुड़कर स्टेशन की तरफ बिल्कुल भी वापस नहीं जाना चाहते थे, क्योंकि जितना वे आगे आ चुके थे, उतना ही उन्हें पीछे भी जाना था,इसलिए उन्हें इसमें कोई विशेष लाभ नजर नहीं आया । अचानक ही उन्हें अपने परम मित्र रामचंद्रन पंढरपुरी का ख्याल आ गया।
फिर क्या था वे खुशियों के मारे उछल से पडे । क्योंकि उनके परम मित्र रामचंद्रन का घर भी,स्टेशन से मात्र डेढ़ कोस के ही दूरी पर था,जिसे आप 4,920 मीटर कह सकते हैं,जहां उनको पहुंचने में ज्यादा समय नहीं लगता ।
रामचंद्रन पंढरपुरी से उनकी अभिन्न दोस्ती थी, जिसे 10 वर्ष पुरानी कह लेना अतिशयोक्ति नहीं होगा । कारण, राम मनोहर पंढरपुरी की बहन सुनैना के ससुराल का रास्ता, इन्हीं रामचंद्रन पंढरपुरी के दरवाजे से होकर गुजरता था, इसलिए भी उन दोनों में गहरी दोस्ती थी । इन्हीं 10 वर्षों में वह जब-जब,अपनी बहन सुनैना के घर आया था, तब तब वह अपने दोस्त रामचंद्रन के घर रुककर,उनका समाचार लेते हुए अपने घर लौटता था,वैसे रामचंद्रन पंढरपुरी से राम मनोहर पंढरपुरी की दोस्ती बड़े ही इत्तेफाक से हुई थी । दोस्ती की शुरुआत भी,उसी रेलवे स्टेशन से हुई थी, जिस स्टेशन को अभी वह कुछ समय पहले छोड़ा था।
बिचारा राम मनोहर पंढरपुरी,अपने अतीत में प्रवेश करते हुए,रामचंद्रन पंढरपुरी से हुई उस दोस्ती के विषय में सोचने लगा था,जो अब किसी चलचित्र की भांति उसके सामने सदृश्य सब कुछ याद आने लगे थे । जब वह पहली बार अपनी बहन सुनैना के घर,अकेले ही जा रहा था,तो उस समय का संयोग भी कुछ ऐसा ही था,जिसे आज की ठंढ से कुछ कुछ जोडा जा सकता है ।
इसमें अंतर सिर्फ इतना सा है कि वह महिना जनवरी सन् 2015 का था,जिसमें मौसम साफ था किंतु ठंड मध्यम दर्जे की थी । और यह महीना 16 दिसंबर सन 2025 का था, जिसमें हिमपात के संग कुहरो का महा भयानक तांडव, तब उसकी उम्र लगभग 42 वर्ष की थी,और अब आज की उम्र, 51, 52 साल के करीब हो चुकी थी । उस समय जब वह ट्रेन से उतरा था, तब रात्रि के ठीक 11 बजकर 50 मिनट हुए थे । प्लेटफॉर्म नंबर चार से निकलने के बाद,उसे पता चला कि अब वहां से कोई भी बस,राजू नगर के लिए नहीं जायेगी, ऐसी खबर सुनते ही वह वहीं मुंह लटकाए हुए खड़े-खड़े कुछ सोचने लगा था, कि इतनी रात गए वह कहां जाएगा, तभी उसे एक अपरिचित व्यक्ति, रामचंदन पंढरपुरी से भेंट हुई । उससे मुलाकात होने के दौरान दोनों में ही हृदय स्पर्शी मैत्रिक संबंध स्थापित हो गए ।
रामचंदन पंढरपुरी ने बताया कि हमारा घर यहां से मात्र 500 मीटर की ही दूरी पर है, क्यों न आज के दिन आप हमारे ही घर चलें, सुबह होते ही आप अपनी बहन के घर चले जाना, आखिर रात में कहां भटकेंगे । ऐसे कहते हुए वह राम मनोहर पंढरपुरी का हाथ पकड़ कर अपने घर की ओर जाने लगे, तब राम मनोहर सकुचाते हुए संकोची भाव में रामचंद्रन के साथ चल दिए थे ।
फिर क्या था दोनों मित्र, आपस में बातें करते हुए, एक दूसरे के कंधों पर हाथ रखकर ऐसे चल दिये, जैसे कि वो एक दूसरे के पुराने मित्र हो । राम मनोहर पंढरपुरी, जब रामचंद्रन के घर पहुंचे, तो वहां रामचंद्रन की तीनों बेटियां, जिनकी उम्र, बड़ी बेटी संध्या 15 वर्ष की, उससे छोटी बेटी सुबिधा, जिसकी उम्र 13 वर्ष की , और सबसे छोटी बेटी दुबिधा, जिसकी उम्र मात्र 10 वर्ष की थी । बेटियां कितनी अभागन थी कि असमय ही मां का साया सर से उठ चुका था ।
जब मां का साया उठ गया—"दोस्ती"
उस दिन राम रामचंद्रन के घर राम मनोहर पंढरपुरी की दोस्ती इस प्रकार से हुई थी,जैसे कि प्रकृति ने ही उन युगलों को भावनाओं से तिरोहित यह अनमोल रिश्ता,विरासत में सौंप दिया हो । किंतु इस बार वे ठीक तीन साल के बाद इस भयानक हिमपात से लब्ध कुहरे में उनके घर अकेले जा रहे थे ।
वहां के सारे रास्ते,पहाड़ी भू–भागों से होकर गुजरते थे, मौसम के बिगड़े हालात के कारण वहां सिर्फ बड़ी-बड़ी गाड़ियों में सिर्फ,रात्रि के भयावह स्थिति में ट्रकों का ही आवागमन था । किन्तु आज का सारा मार्ग कुहरो के चपेट में,हिमकणों से आच्छादित था । वहां की वनस्पतियों एवं बड़े-बड़े वृक्षों, जिनकी पत्तियों और शाखाओं पर, सफेद रूई के फ़ाओं की भाँति ओले पड़े हुए स्पष्ट दृष्टिगोचर हो रहे थे ।
यह कहानी पूर्णतः काल्पनिक है, इसका उद्देश्य केवल साहित्यिक मनोरंजन और मानवीय भावनाओं को प्रस्तुत करना है।
लेखक: श्री केदार नाथ भारतीय
ब्लॉगर | कहानीकार
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