शनिवार, 14 फ़रवरी 2026

दोस्ती 3|राम मनोहर पंढरपुरी का सपना या हकीकत—केदार नाथ भारतीय की हिंदी कहानी

 
महल में बैठे दो दोस्तों का भावनात्मक दृश्य, जिसमें राम मनोहर पंढरपुरी के सपने, गरीबी और दहेज प्रथा की सच्चाई दर्शाई गई है – दोस्ती 3 हिंदी कहानी
क्या वह राजमहल सच था या टूटी हुई जिंदगी का एक सपना? दोस्ती, दहेज और गरीबी की मार्मिक सच्चाई – दोस्ती 3।

उसने बताया कि एक सप्ताह पहले यहां मेरी तीन बकरियां गुम हो गई थी, एक मिली और दो अभी नहीं मिल सकी है उन्हीं को ढूंढते–ढूंढते मैं यहां पहुंचा था, दूर से जब मैंने आपको देखा तो मुझे लगा कि शायद आप ही बकरियां चोर हैं आपके पास आया तो आप गहरी नींद में सो रहे थे, मैंने आपको उठाने का प्रयास किया तो आप उठे, किंतु आपने रामचंद्रन पंढरपुरी के विषय में जो कुछ भी हमें बताएं उसे सुनकर हमें भी गहरा सदमा पहुंचा है, हम भी भयभीत हो उठे हैं । 

यह कहानी केवल शब्दों का क्रम नहीं, बल्कि उन रिश्तों की गूंज है...आइए, इस दुर्गम पथ पर राम मनोहर के साथ चलें और दोस्ती के उस अर्थ को समझें जो हर मोड़ पर खुद को साबित करता है।

लेखक: केदार नाथ भारतीय उर्फ भुवाल भारतीय, उत्तर प्रदेश, प्रयागराज

।। दोस्ती।। 

वे हड़बड़ाते घबराते हुए उस नरम गद्देदार सोफे पर जा पसरे जो वहां पहले से ही बिछे हुए थे । अब राम मनोहर पंढरपुरी के वे दोनों गोल मटोल नैन, उस दिव्य भब्य मकान को अपनी  दोनोँ पुतलियों को फाड़े फाड़े, एक बार नहीं बल्कि बार बार अविश्वसनीय दृष्टि से निहारे जा रहे थे । वह मकान ही ऐसा था जिसे देखकर किसी की भी आँखें आश्चर्य से फटी की फटी रह जाती । 

उस मकान को मकान भी कह लेना, निश्चित ही उस मकान का अपमान  होता, क्योंकी वह मकान ही कुछ ऐसा था जिसे देखकर कोई भी व्यक्ति,बड़े ही गर्व से उसे राजमहल ही कहता। वह दो मंजिला मकान शीशे का बना हुआ दिखाई पड़ रहा था, बाहर से हिमपात और ओलावृष्टि का प्रभाव किंतु मकान के अंदर का वातावरण, पूरी तरह से वातानुकूलित । 

वह अद्भुत और आश्चर्यजनक मकान था । चतुर्दिक सौंदर्यता का अभिराम मन को मोह लेने जैसा था ।

राम मनोहर पंढरपुरी ऐसे मकान को देखते ही अवाक से हो उठे थे, उनका मुंह खुला का खुला, उनकी दृष्टियां भी मकान के भीतर चारों तरफ से किसी लट्टू की भांति नाचने लगी थी, तभी रामचंद्रन पंढरपुरी ने उन्हें आवाज लगाई ।

रामू,,,, पगले, कहाँ खो गया, क्या मुझसे बातें नहीं करेगा ? 

रामचंद्रन पंढरपुरी  वैसे तो अक्सर राम मनोहर पंढरपुरी को मनोहर ही कहा करता था किंतु कभी-कभी जब वह अत्यधिक प्रसन्न होता था तब उसे वह मनोहर की जगह रामू ही कहकर बुलाने लगता था । 

आं,,,, आं,,,,आं,,,,अरे,,,,हां,,,, हां,,,, हां,,,।  बोलो  बोलो न राम, क्या बोल रहे हो, मैं सब सुन रहा हूँ बोलो तो सही,,,, 

राम मनोहर पंढरपुरी चौकते हुए ऐसे बोले थे जैसे कि वे अभी-अभी नींद से जागें हो ।

ऐसे चारों तरफ अपनी फटी फटी आंखों से क्या निहारे जा रहे हो रामू हमें भी तो बताओ । 

रामचंद्रन पंढरपुरी मंद मंद मुस्कुराते हुऎ बोले थे,कि तभी राम मनोहर पंढरपुरी भी तपाक से बोल पड़े थे ।

यार राम,तुमने तो ये अपना घर मकान बड़ा ही आलिशान बनवा रखा है, क्या कोई लॉटरी लगी थी क्या, वह भी जब मैं तीन साल पहले यहां आया था,तब तुम्हारे पास कायदे की झुग्गी झोपड़ी भी नहीं थी, अब इन तीन सालों में  तुमने ऐसी कौन सी कमाई कर ली कि ये घर कम, किन्तु राजमहल ज्यादा दिखाई पड़ रहा है । 

हां यार,तू जो कुछ भी समझ ले वह  सब ठीक है, लेकिन क्या तुम भी ढेर सारे रुपए कमाना चाहते हो । 

रामचंद्रन पंढरपुरी हौले से मुस्कुराते हुऎ राम मनोहर पंढरपुर से बोले थे । 

हां यार हम भी ढेर सारे रुपए कमाना चाहते हैं, किन्तु कैसे, इसका आईडिया मेरे पास नहीं है, तू बता । 

राम मनोहर पंढरपुर बड़े उतावले पन से पूछे थे । 

तो सुन मैं आइडिया बता रहा हूं । अरे नहीं यार,मैं तो यूं ही कह रहा था मुझे आइडिया वायडिया नहीं सुनना, तू तो जानता है कि मेरी याददाश्त कितनी कमजोर है, जब मैं बचपन में गणित के सवाल नहीं हल कर पाता था, मेंसुरेशन क्या है उसे नहीं जान पाता था, तो तेरी ये  रूपए पैसे वाली आइडिया और भी टेढ़ी-बीड़ी होगी।

इसे कैसे जान पाऊंगा, सुन के सुन्नी हो जाऊंगा परंतु इस पर चल नहीं पाऊंगा, मैं सब भूल जाऊंगा मुझे तो मेरे इसी हाथ पर रहने दो, मैं छोटा हूं छोटा ही रहने दो मुझे, क्योंकि छोटे होने में जो सुख मिलता है, जो आजादी और आनंद मिलता है वो बड़ा होने में नही बिल्कुल भी नहीं,  छोटे होने के सुख के क्या कहने, उसके अंदाज ही कुछ निराले होते, नो टेंशन नो किंतु परंतु। 

क्या बड़ा आदमी मरता नहीं,छोटे ही मरते हैं, अरे मरते सब हैं, लेकिन न बड़ा आदमी और न ही छोटा आदमी, मरते समय यहां से कुछ भी नहीं ले जा पाता, सब के सब यहीं पर छूट जाते हैं, इससे हमें बड़ा आदमी बनने में क्या फायदा । वैसे हम बड़ा आदमी बनने के नुस्खे कई कई लोगों के मुंह से सुने हैं, मुझे जचा नहीं, बड़ा आदमी बनने में बड़ा दिमाग लगता है, छोटा आदमी बनने में छोटा दिमाग लगता है, शॉर्टकट अपनाओ तो जेल जाओ  चक्की पीसो, नहीं तो गोली खाओ, ऊपर जाओ । 

तभी रामचंद्रन पंढरपुरी की तीनों बेटियां, संध्या सुविधा और दुविधा  धीरे-धीरे चलती हुई वहां चाय लेकर पहुंच जाती हैं। उन तीनों को देखते ही राम मनोहर पंढरपुरी की दोनों आंखें,फटी की फटी रह गई थी । वैसे भी इन तीनों बच्चियों की खूबसूरती के चर्चे, दूर-दूर तक फैले हुए थे ।

दिव्य ज्योति रंभा मेनका और उर्वशी जैसी सुंदरियों की छबिया लिए, श्रृंगाररत तीनों बेटियां मंद मंद मुस्कुराती हुई  राम मनोहर पंढरपुरी के नजदीक पहुंचते ही उन्हें नमस्ते अंकल कहकर,अभिवादन शिष्टाचार  का संस्कार बड़े ही अदब से पूर्ण करते हुए चाय का ट्रे लिए,वही टेबल पर रखकर वे तीनों बहने बड़े ही मधुभाषी स्वर मे एक साथ एक ही सुर में बोली थी।

अंकल बड़े दिनों के बाद आप आए हैं अब तक कहां थे हम सब की सुधियाँ ही भूल गए थे,हमारे पापा और हम  तीनों बहनें आपकी ही बाट जोह रहे थे । 

बेटा,,, मैं क्या करता, मैं तो हमेशा हमेशा से यही चाह रहा था कि कब तुम सभी से मुलाकात करूँ, किंतु यह जरूरी नहीं होता बच्चों कि इंसान  जहां भी जाना चाहे जिससे मुलाकात करना चाहे या जो कुछ भी वह सोचे समझे, वह झट से हो जाए, बच्चों इस संसार में हर एक इच्छाओं की पूर्ति सिर्फ विधाता के हाथों में है,  वही सब को नाचना चाहता है वही सबसे मुलाकात करवाता है । 

अरे संध्या बेटा,जाओ कुछ खाने पीने का कुछ व्यंजन तो बना कर आओ, आपके अंकल बड़ी दूर से आए हैं वे भूखे प्यासे होंगे। रामचंद्रन पंढरपुरी अपनी बच्चियों को बड़े प्यार से समझाते हुए बोले थे। "हां पापा अभी गई"

संध्या ने कहा था, देखते ही देखते तीनों बच्चियों  किचन की ओर दौड़ पड़ी थी।

राम मनोहर पंढरपुरी उन तीनों को जाते हुए ऐसे देख रहा था जैसे कि वो दुनिया की सबसे सर्वश्रेष्ठ सौंदर्य प्रभाओं में एक,अत्यंत ही लोमहर्षक सातवां अजूबा हों । वे कुछ सोचते हुए रामचंद्रन पंढरपुरी से कोतूहलता वस पूछे थे । 

ये अपनी बेटियों कितनी जल्दी सयान हो गई राम भैया, इनके शादी विवाह के विषय में कुछ सोचे हैं । जब मैं आपके घर तीन साल पहले आया था, तो उसे समय बेटियां कितनी छोटी-छोटी थी किंतु आज देख रहा हूं कि ये यूकेलिप्टस का पेड़ बन गई है । 

इसमें हमारा और आपका कोई बस नहीं रामू, ये सब विधि का विधान है, रही इनकी शादियों की बात, तो इनका ब्याह हो चुका है। ब्याह हो चुका है, ये कैसी बातें कर रहे हो, हमें खबर तक नहीं और इन प्यारी बेटियों का शादी ब्याह कर दिए, आश्चर्य है यार, क्या इसी का नाम दोस्ती है । 

राम मनोहर पंढरपुरी बड़े ही आश्चर्य भाव में रामचंद्रन पंढरपुरी से पूछे थे, तब  रामचंद्रन पंढरपुरी बड़े ही भावुकता पूर्ण लहजे में,शांत चित होकर राम मनोहर पंढरपुरी से बोले थे, मेरे प्यारे रामू, मुझे स्वयं नहीं पता था कि मेरी बेटियां स्वयं से शादी कर लेगी, लेकिन जब मुझे पता चला कि मेरी बेटियां अपने से ही अपनी शादी कर बैठी है, तब मेरे पैरों तले से जैसे जमीन ही खिसक गई हो, मरता क्या नहीं करता, मुझे ऐसा लगा जैसे कि अब मेरी सांसे ही रुक गई हो । 

फोन पर तुमने मुझे बताया क्यों नहीं। बताता कैसे जब मेरे पास फोन रहता तब तो बताता, मेरा फोन पहले से ही कहीं खो गया था। ओह, मेरे यार ,  तुम ये सारा दुख अकेले ही झेले, यही मेरे लिए सबसे बड़ा दुख है, लेकिन तू घबरा मत मैं बेटियों को समझाऊंगा कि वह स्वयं से  विवाह कैसे कर सकती है, कहीं ऐसा भी होता है क्या,की कोई भी बेटा बेटी अपने से ही अपनी शादी कर ले ।

अब तेरे समझाने से कोई फायदा नहीं होगा,उनकी सारी दुनिया बदल चुकी है, रामचंद्रन पंढरपुरी इतना ही बोल पाए थे कि तभी उनकी तीनों बेटियां, अलग-अलग दो थालियां में भोजन परोस कर वहां ले आई थी एक बेटी के हाथ में पानी का थरमस था जिसका नाम दुविधा था एवं सुविधा के हाथ में गिलास था तथा संध्या अपने दोनों हाथों में भोजन की थाली लिए हुए थी। 

भोजन की खुशबूदार महक से राम मनोहर पंढरपुरी के पेट में जैसे भोजन के लिए भूखा भूत सवार हो चुका हो, वह अतिशीघ्र ही भोजन करने के लिए तड़पने लगा था,

भोजन में मछली भात और रोटी था । अब वे दोनों रामचंद्र पंढरपुरी और राम मनोहर पंढरपुरी एक साथ अपनी अलग-अलग थालियों में भोजन करने लगे थे । 

तभी बड़ी बेटी संध्या वहां से किचन में जाकर शराब से भरी हुई एक बोतल लाती है, उन दोनों के आगे रखती हुई धीरे से बोली थी, पापा जी और अंकल जी, ये लीजिये आप दोनों का मनपसंद इंजॉय, इसके अलावा आप दोनों को किसी भी चीज की जरूरत हो तो आवाज दीजिएगा हम तीनों बहनें तुरंत आ जाएगी । 

शराब की बोतल देखते ही राम मनोहर पंढरपुरी की वान्छे खिल गई, वह रामचंद्र पंढरपुरी की तरफ देखते हुए होले से मुस्कुराया, रामचंद्रन पंढरपुरी भी राम मनोहर पंढरपुरी को देखकर मंद मंद मुस्कुराते हुए बोले, रामू पैग बनाओ थोड़ा सा ड्रिंकिंग किया जाए, जरूर जरूर राम भैया । 

इतना कहते ही राम मनोहर पंढरपुरी पलक झपकती ही उस कांच की गिलास में दारू ढालने लगे । अब वे दोनों दारू पी रहे होते हैं । 

अभी पांच मिनट का समय भी नहीं हुआ होगा कि वे दोनों शराब के नशे में  धुत एक दूसरे की बाहों में समाते चले गए, अब वे दोनों मित्र आपस में एक दूसरे की बाहों को थामे हुए यारी दोस्ती के गीत गाते गाते झूमने लगे थे,

इधर संध्या सुविधा और दुविधा भी किचन रूम से बाहर निकलकर ड्रॉइंग हॉल में आकर घर में पहले से ही रखे हुए ढोल ताशे और नगारे बजा बजा कर,दोस्ती यारी के गीत को संगति देने लगे थे । 

पता नहीं वे सब कब तक ऐसे यूं ही आपस में एक दूसरे की बाहों को पकड़े हुए नाच गा रहे थे ।देर रात तक पता नहीं वे कब तक  अपने-अपने बिस्तर पर जाकर सोए हुए थे ईश्वर जाने । सुबह जब राम मनोहर पंढरपुरी की आंखें खुली, तब उसके सामने एक बकरी चरवाहा खड़ा दिखाई पड़ा था,  दूर दूर तक वहाँ बकरी चरवाहे के अलावा  एक भी घर मकान या बस्ती नहीं  दिखाई दे रही थी । वह जहां सोया था, वहां एक बड़ी सी गहरी खाई भी थी, जिसके चारों तरफ बड़ी-बड़ी झाड़ियां, वनस्पतियां एवं कटीले नागफनी के पौधे उगे हुए थे । 

दूर-दूर तक वहां सघन वन्य क्षेत्र का विस्तार था । सूर्य की किरणें भी अपना अप्रतिम आभा बिखेरे हुए सारी प्रकृति को अपने मनोहारी छवियों में परिवर्तित करके,सुबह सवेरे सुप्रभात श्रृंगार से कण कण को संवारते हुए उसे और भी सुंदर एवं हृदय ग्राही बना रहे थे । 

राम मनोहर पंढरपुरी  स्वयं को ऐसे निर्जन स्थान पर पाकर,भयभीत और आश्चर्यचकित हो रहे थे । 

उनकी साँसे उन्हें उखड़ी उखड़ी सी महसूस होने लगी थी, उनके दिल की धड़कने भी तेज हो गई थी, फेफड़े मानो फूलने पिचकने लगे हों । वे वहाँ बकरी चरवाहे को अपने सामने  अकस्मात देखते ही भौचक्क से हो उठे थे  ।

वे मन ही मन बड़बड़ाये थे, मैं कहाँ पहुंच गया मेरे दोस्त का घर यहां से कहाँ गया, वे बच्चीयां कहाँ गई जिन्होने मुझे अच्छे और स्वादिष्ट भोजन कराए थे । वह अपने सामने चरवाहे को देखते ही गिड़गिड़ाया था । भैया, हम तो अपने दोस्त रामचंद्रन पंढरपुरी के घर आये थे, उनके घर मेरा बड़ा ही स्वागत हुआ था, बड़ा ही आवभगत भावभगत हुआ था, उनका घर भी देखने में किसी राजमहल से कम नहीं था, उनकी तीन बेटियां भी थी, जिनके नाम क्रमशः संध्या सुविधा और दुबिधा था, वे जवान बच्चियों सीधे स्वर्ग की परियों जैसी दिख रही थी उनके हाथ से बनाए हुए हमने स्वादिस्ट भोजन भी किये थे, उनके सर पर हमने अपने आशीर्वाद के हाथ भी रखें थे, हम सब आपस में साथ साथ नाचे गाये और झूमे भी थे,उसके बाद हमें नींद आने लगी,तो हम गद्देदार बिस्तर पर जाकर आराम से सो गए थे ।

किंतु  मेरे दोस्त रामचंद्रन पंढरपुरी का वह राजमहल सा दिखने वाला घर, अब कहां है। सुबह होते होते मैं यहां कैसे पहुंच गया, हे भगवान कहीं मैं पागल तो नहीं हो गया हूं, मेरा दिमाग तो नहीं खराब हो गया है । भैया, आखिर  हम यहां अकेले कैसे हो गए  । 

ऐसे कैसे हो रहा है मेरे साथ, मुझे तो कुछ भी समझ में नहीं आ रहा है, आखिर वह मेरा प्यारा दोस्त रामचंद्रन पंढरपुरी, उसके तीन बच्चे और वह राजमहल कहाँ  गया । राम मनोहर पंढरपुरी की सारी बातें सुनने के बाद, वह भेड़ बकरी चरवाहा हक्का-बक्का होते हुए वह वहां से  उन्हें कुछ दूरी पर ले जाकर, जो कुछ भी बताया उसे सुनते ही वे बुरी तरह से भयभीत होकर कांपने लगे थे ।

उसने बताया कि एक सप्ताह पहले यहां मेरी तीन बकरियां गुम हो गई थी, एक मिली और दो अभी नहीं मिल सकी है उन्हीं को ढूंढते–ढूंढते मैं यहां पहुंचा था, दूर से जब मैंने आपको देखा तो मुझे लगा कि शायद आप ही बकरियां चोर हैं आपके पास आया तो आप गहरी नींद में सो रहे थे, मैंने आपको उठाने का प्रयास किया तो आप उठे, किंतु आपने रामचंद्रन पंढरपुरी के विषय में जो कुछ भी हमें बताएं उसे सुनकर हमें भी गहरा सदमा पहुंचा है, हम भी भयभीत हो उठे हैं ।

जानते हैं वह भी मेरा जिगरी दोस्त था, वह उस स्थान पर, जहां आप अभी  कुछ समय पहले सोए हुए थे,वह  रामचंद्रन पंढरपुरी अपनी झुग्गी झोपड़ी बनाकर रह रहा था । उसकी तीन बेटियां थी, जिसे आपने अभी अभी मुझे बताया था । बड़ी बेटी उसकी संध्या थी,रामचंद्रन पंढरपुरी के सपने भी बहुत ऊचे थे, वह अच्छा सा घर बनवाना चाह रहा था, लेकिन बेटियों के लालन पालन और उनके शादी विवाह के चक्कर में ऐसे फंसा कि उसी में वह फंसकर दुनिया से सदा–सदा के लिए अलग हो गया । 

बेचारा रामचंद्रन पंढरपुरी, पूरी तरह सीधा-साधा, सत्यवादी, बड़ी बेटी संध्या की शादी के सात फेरे के समय उनका समधी, यानि कि लड़के का बाप ₹50000 नगदी मांग बैठा जिसे वे देने में पूरी तरह से असमर्थ थे।

वे बेचारे उनके पैर पकड़ लिए अपने सर की पगड़ी उतार कर लड़के के बाप के पैरों पर रखकर अपना माथा पीटने लगे की भैया बाद में कोशिश करके दे दूंगा किंतु वह क्रूर व्यक्ति दहेज का लोभी, उनकी एक भी बात नहीं मानी और फिर अपनी बारात उनके दारवाजे से वापस लेकर चला गया । 

रामचंद्रन पंढरपुरी लज्जा से अपने सर को पीट-पीट कर रोने लगे थे, उनकी रुलाहट जो भी सुनता उसका कलेजा फटने लगता । ठीक तीसरे दिन शाम को बेटियों ने जो निर्णय लिया था, उस निर्णय से तो धरती आसमान का भी  कलेजा सूख सूख कर ठुंठ सा हो गया हो होगा, उनका विशाल पवित्र हृदय भी कांप कांप कर,उनकी नैन ज्योतियों को  उन्हीं की आंसुओं में डुबो डुबोकर, निश्चित है सुनामी ला दिया होगा।

भैया वे तीनों बेटियां,अपने ही मड़ेया की बड़ेरी में  फांसी लगा लगाकर जान दे दी, जिसे देखकर अपना वह प्यारा दोस्त रामचंद्रन पंडित पुरी बर्दाश्त नहीं कर सका और फिर रोते कलपते हुए एक दिन उसकी भी सांसे हमेशा हमेशा के लिए रुक गई।

बकरी चरवाहे का गला भर्रा सा उठा था, उसके दोनों नेत्र आंसुओं में डूब चुके थे, बेचारे राम मनोहर पंढरपुरी की दोनों टांगे थर-थर कांपने लगी थी जैसे कि अब उन्हें लकवा मार देने वाला हो, उनका गला पूरी तरह से सूख चुका था, होठों पर पापड़ियां पड़ चुकी थी, उन्हें ऐसा लगने लगा था जैसे कि अब वे अपने शरीर का संतुलन नहीं संभाल पाएंगे और वहीं गिर जाएंगे 

Blogger: Nagendra bahadur bharatiya 

उस सुनसान जगह पर खड़े-खड़े मुझे समझ में आ गया कि असली महल पत्थरों से नहीं, इंसान के सपनों से बनता है।

रामचंद्रन पंढरपुरी का राजमहल शायद कभी था ही नहीं… वह उसके सपनों का घर था, जो दहेज की आग में जलकर राख हो गया।

मैं कांपते हुए बस इतना ही सोच पा रहा था— अगर समाज बदल जाता, तो शायद आज मेरा दोस्त जिंदा होता।

दोस्ती की कसमें, सपनों के महल और बेटियों की मुस्कान… सब कुछ दहेज की एक मांग ने छीन लिया।

अगर आपको भी लगता है कि सपनों को बचाना जरूरी है…

तो इस कहानी को आगे बढ़ाइए, इसे अपने दोस्तों, परिवार और समाज तक पहुंचाइए। क्योंकि कहानियाँ सिर्फ पढ़ने के लिए नहीं होतीं, वे बदलाव लाने के लिए होती हैं।

यह कहानी पूर्णतः काल्पनिक है, इसका उद्देश्य केवल साहित्यिक मनोरंजन और मानवीय भावनाओं को प्रस्तुत करना है।

कहानी लेखक: केदार नाथ भारतीय उर्फ भुवाल भारतीय, प्रयागराज 

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