क्या आप सभी में से किसी ने सोचा है कि भाषा सिर्फ बोलने का तरीका नहीं है ? हर शब्द के पीछे एक पूरी कहानी, एक अनुभव, एक एहसास छुपा होता है। हम रोज "ओह", "आह", "दुख", "सुख" जैसे शब्द बोलते हैं, लेकिन रुककर कभी महसूस किया है कि इन शब्दों को सुनते ही हमारा मन क्यों पिघल जाता है ? क्यों विश्व का कोई भी व्यक्ति, चाहे वो किसी भी देश का हो, इन शब्दों को सुनकर संवेदनशील हो जाता है? आज के इस सुविचार में हम इसी बात की गहराई में उतरेंगे। ।। मुख्य सुविचार ।। ओह,आह,आश्चर्य, दर्द,पीड़ा, सुख और दुख, ऐसे शब्द हैं जिन्हें विश्व का कोई भी व्यक्ति सुनकर संवेदनशील हो सकता है,जैसे ये सारे शब्द, शब्द नहीं स्वयं में ही दर्द हो, आखिर ऐसे शब्दों को बनाने वाले हमारे पुरखे कितने अनुभव शील रहे होंगे । केदारनाथ ऊर्फ भुवाल,,,,,। शब्दों के पीछे की कहानी जरा सोचिए, "ओह" शब्द सबसे पहले किसने बोला होगा? शायद हजारों साल पहले कोई पुरखा जंगल में शिकार कर रहा होगा। अचानक पैर में कांटा चुभा,...
शब्द कम हैं, एहसास ज्यादा हैं… मेरा जीवन—कविता (दोहावली) यह कविता जीवन की सादगी, सच्चाई और पारदर्शिता को दर्शाती है। इसे दोहा शैली में भी पढ़ा जा सकता है, जिससे इसकी भावनात्मक गहराई और अधिक प्रभावशाली हो जाती है। इस रचना के माध्यम से लेखक शायद यह बताना चाहते हैं कि एक सच्चा जीवन वही है, जो बिना किसी छल, दिखावे और बनावट के जिया जाए—ठीक एक खुले पन्ने या कोरे कागज की तरह, जिसमें हर भाव स्पष्ट और निष्कपट हो। तेरा, मेरा जीवन—एक कविता (दोहावली) मेरा जीवन कोरा कागज, स्वच्छ सरोज निकुंज । खुली किताबों जैसी ज्ञानें, स्वतंत्र सुभाषित पुंज ।। पढ़ लीजै यह जीवन भंगुर, जीवन आपके साथ । साथ बिछुड़ना कब हो जाये, जानें जग के नाथ ।। यज्ञ...