क्या आप सभी में से किसी ने सोचा है कि भाषा सिर्फ बोलने का तरीका नहीं है ? हर शब्द के पीछे एक पूरी कहानी, एक अनुभव, एक एहसास छुपा होता है। हम रोज "ओह", "आह", "दुख", "सुख" जैसे शब्द बोलते हैं, लेकिन रुककर कभी महसूस किया है कि इन शब्दों को सुनते ही हमारा मन क्यों पिघल जाता है ? क्यों विश्व का कोई भी व्यक्ति, चाहे वो किसी भी देश का हो, इन शब्दों को सुनकर संवेदनशील हो जाता है? आज के इस सुविचार में हम इसी बात की गहराई में उतरेंगे। ।। मुख्य सुविचार ।। ओह,आह,आश्चर्य, दर्द,पीड़ा, सुख और दुख, ऐसे शब्द हैं जिन्हें विश्व का कोई भी व्यक्ति सुनकर संवेदनशील हो सकता है,जैसे ये सारे शब्द, शब्द नहीं स्वयं में ही दर्द हो, आखिर ऐसे शब्दों को बनाने वाले हमारे पुरखे कितने अनुभव शील रहे होंगे । केदारनाथ ऊर्फ भुवाल,,,,,। शब्दों के पीछे की कहानी जरा सोचिए, "ओह" शब्द सबसे पहले किसने बोला होगा? शायद हजारों साल पहले कोई पुरखा जंगल में शिकार कर रहा होगा। अचानक पैर में कांटा चुभा,...
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| कविता – दुख ही दुख की भाषा समझे लेखक – केदारनाथ भारतीय उर्फ भुवाल भारतीय |
।। दुख सुख ।। कविता ।।
दुःख तो सुख से न्यारा प्यारा,
प्रेम की गंगा धारा है ।
निश्चल आत्म हितैषी वाणी,
मन का राज दुलारा है ।।
प्रेम की गंगा धारा है ।
निश्चल आत्म हितैषी वाणी,
मन का राज दुलारा है ।।
सबको याद है करता निशदिन,
मधुर मधुप रस घोलो से ।
दुख ही दुख की भाषा समझे,
मिलन करें मधु बोलो से ।।
दुख को देखें सुख जब भैया,
दुख से सुख कुछ दूर हटे ।
हंसी उड़ाए मुंह. बिचकाए,
हेय दृष्टि विष फुट पड़े ।।
सुख हिंसक निष्ठुर अति कामी,
दयाहीन पाषाण अधम ।
व्यवहार निरंकुश निरा उदंडी,
याद करे न अपना परम ।।
इससे बेहतर दुख ही उत्तम,
सबकी सुधिया लेता है ।
मनोभाव सम्मान से जाकर,
सबको गले लगाता है ।।
केदारनाथ भारतीय
यह कविता जीवन के अनुभव और दर्द को बहुत सरल शब्दों में बताती है।
आज के समय में ऐसी सच्ची कविताएँ कम देखने को मिलती हैं।
केदारनाथ भारतीय उर्फ भुवाल भारतीय
(प्रयागराज, उत्तर प्रदेश)
यह कविता Kedar Ki Kalam ब्लॉग पर प्रकाशित की गई है। ऐसी ही और कविताएं पढ़ने के लिए
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