कविता – दुख ही दुख की भाषा समझे लेखक – केदारनाथ भारतीय उर्फ भुवाल भारतीय ।। दुख सुख ।। कविता ।। दुःख तो सुख से न्यारा प्यारा, प्रेम की गंगा धारा है । निश्चल आत्म हितैषी वाणी, मन का राज दुलारा है । सबको याद है करता निशदिन, मधुर मधुप रस घोलो से । दुख ही दुख की भाषा समझे, मिलन करें मधु बोलो से ।। दुख को देखें सुख जब भैया, दुख से सुख कुछ दूर हटे । हंसी उड़ाए मुंह. बिचकाए, हेय दृष्टि विष फुट पड़े ।। सुख हिंसक निष्ठुर अति कामी, दयाहीन पाषाण अधम । व्यवहार निरंकुश निरा उदंडी, ...
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— Nagendra Bharatiy
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