लेखक: केदारनाथ भारतीय (भुवाल भारतीय)
![]() |
| डॉ. भीमराव अंबेडकर – ज्ञान, समानता और संविधान के महान शिल्पकार। |
भारत के महान समाज सुधारक, संविधान निर्माता, विधिवेत्ता और करोड़ों लोगों के प्रेरणास्रोत डॉ. भीमराव रामजी अंबेडकर का जीवन संघर्ष, शिक्षा, समानता और आत्मसम्मान का अद्भुत उदाहरण है।
प्रस्तुत काव्य-श्रृंखला "डॉ. भीमराव अंबेडकर का संघर्ष" आदरणीय केदारनाथ भारतीय द्वारा रचित एक मौलिक साहित्यिक कृति है। इस श्रृंखला में डॉ. अंबेडकर के जीवन, उनके संघर्ष, विचारों और समाज के प्रति उनके महान योगदान को काव्य के माध्यम से प्रस्तुत किया गया है।
आज इस श्रृंखला का प्रथम चरण – "वंदना" आपके समक्ष प्रस्तुत है। आशा है कि यह रचना आपको प्रेरित करेगी तथा डॉ. अंबेडकर के व्यक्तित्व और कृतित्व को और निकट से समझने का अवसर प्रदान करेगी।
डॉ भीमराव अंबेडकर का संघर्ष
।। प्रथम चरण ।।
।। बंदना ।।
ओम त्रयंबकम आशुतोषम,
मां जगदंबे नमो नमस्तुते ।
विरंचि विधाताये कमल नयने,
मां सरस्वती सर्व मंगले ।।
विघ्न विदारण दारूण दरण,
गौरी सुते वक्रतुंडे नमः।
पवन तनय संकट हरन,
हनुमते सीता रमये नमः ।।
महू छावनी सुचि इंदौर बसुन्धरे,
जनमें भीमहि उर वंदनम ।
प्रजापतिस्त्वं विधि तेज बिराजे,
उदय हुए भू आर्यावर्तनम ।।
।। सवैया ।।
रामजी मालो,मां भीमाबाई,
जनमेंहू पुत्र,विरद प्रकाशा ।
चौदहवीं,सुत रतन कहायो,
उतरेहुं भीम,ऊचे आकाशा ।।
दिन बुधवार,घडी साढ़े चार,
ब्रह्म मुहूर्त, प्रभात का आना ।
सन अठ्ठारह, सौ एक्यांन बे,
अप्रैल चौदह,जिया हरसाना ।।
सोहर छंद, सोरठा को गावतु,
ढोल बजावतु नाचति नारी ।
नाम सकपाल, चाल अभिरामा,
मगन मुदित,रस टपके द्वारी ।।
जाति महार, अछूत हरिजन ये,
कहें बड़े कौम, नीच घराना ।
रामजी मालो, ब्रिटिश मिलीटरी,
जाति महार,रिटायरी बाना ।।
दोहा, ,,,,
अर्थहीन अकिंचन कुल,
मन था अति लाचार ।
गृह नगर को छोड़ चले,
आ गए ओ महाराष्ट्र ।।
शहर सतारा प्यारा था,
जाति अछूत का दंश ।
चालीस रूपये माह की,
सर्विस पा हुए दंग ।।
चौपाई, ,,,,
बिजनेस विश्व में सबसे अच्छा ।
सबका बिजनेस हो एक शिक्षा ।।
मन बिठाय बाबा को पढ़ावें ।
पाठशाला जा नाम लिखावें ।।
जाति महार अछूत पूत तन ।
घृणा करें जो भी देखें जन ।।
नाक दाब थू थू कर भागें ।
मुंह बिचका ढिग ना कोई लागे ।।
दोहा, , ,,
शिक्षा सबके बस की नहीं,
बोले प्रधानाचार्य ।
सबसे पीछे बैठेगा ये,
दूर रहेंगे आचार्य ।।
अछूत जाति होने के कारण,
छूना है अपराध ।
इसी शर्त पर एडमिशन,
हो रहा करना याद ।।
चौपाई, ,,,
बैठ कतार के पीछे बाबा ।
शिक्षा लें पर दमके आभा ।।
चहु दिश छाई जाति भ्रांतियां ।
विप्र हनें नित निम्न जातियाँ ।।
जाति अछूत कह ताना देते ।
अविरल जल नैनन से बहते ।।
पाठशाला नित विद्या अध्ययन ।
सुन अछूत उर कापे तन मन ।।
दोहा, ,,,
कोमल कमल मस्तिष्क जो,
सहतु अनल शर पीर ।
जाति-पात से गात गंध क्यों,
ये विषय बड़ा गंभीर ।।
अस्त्र-शस्त्र है शिक्षा तंत्र,
जो हर प्रश्नों का आंसर ।
पिता की वाणी स्मृति में,
छाये रहतु प्रतिक्षण ।।
चौपाई,,,,
एक दिन हुए भीम जी प्यासे ।
अधर सूख गले अटकी सांसे ।।
खड़ा घड़े ढिंग एक चपरासी ।
कहतु महार न दे जल त्रासी ।।
विनय विनीत भीम ने कीन्हा ।
गुरु प्रयास तब जल वो दीन्हा ।।
दुष्ट ने जल अजुरी में पिलाया ।
आत्मग्लानि मन टीस समाया ।।
दोहा, ,,,
रैन दिवस वे सह रहे,
जाति अछूत का दंश ।
शूद्र समाज को दल रहे,
सवर्ण जाति निरकूष ।।
इनकी परछाहीं से भी,
घृणा नरक जैसी ।
जहां भी देखें शूद्रों को,
भौकें स्वर स्वानों सी ।।
चौपाई, ,,,,
एक दिवस की याद विशेषा ।
चमके स्मृति में जसु शीशा ।।
डिप्टी साहब का वह प्रश्न ।
संस्कृत में जो स्वर व्यंजन ।।
कितने होते अलग बताओ ।
किसमें लय सिंगार सुनाओ ।।
सवर्ण छात्र यूं इत उत देखें ।
प्रश्न कठिन तनु चेहरा सूखे ।।
दोहा,,,,,
भीमराव का सुर्ख स्वरूप,
बोलेहु ऊचे शीश ।
संस्कृत भाषा में स्वर 14,
व्यंजन है तैतिस ।।
चार आयोगवाह की संधि,
कर दे योग पचास ।
लय का स्वर दीर्घ स्वरों में,
संदर्भित चले स्वांस ।।
श्रृंगार बद्ध है हस्व स्वर,
जो संदर्भित करता ।
जितने बैठे गुरुजन सज्जन,
सबका सर झुकता ।।
चौपाई, ,,
एक दिन बाबा मगन मयूरा ।
चल दिए होटल खाने भटूरा ।।
जाति पूछ मालिक उन्हें डाटा ।
धक्का दे नाखून से काटा ।।
गटर कचड़ गिरे विभव हमारे ।
ऊच शिखर अरि हीं हीं वारे ।।
मान गया अपमान रुलाया ।
जाति आडंबर नरक दिखाया ।।
दोहा, ,,,
एक दिवस तांगे पर बाबा,
बैठे मन हरसाय ।
कुछ दूरी पर तांगेवाला,
पूछा जाति कुहायं ।।
जाति शूद्र जब बोले बाबा,
वह मूरख चिल्लाय ।
उतार दिया तांगे से अपने,
तांगे को धुलवाय ।।
चौपाई, ,,,,
यादों की वह कैसी क्षमता ।
करतु स्मरण मां की ममता ।।
नैनों में काजल तन उबटन ।
कौर खिलाये मां ले चुंबन ।।
रैन दिवस जननी की बलैया ।
यादों में जना हंसि रही मैया ।।
मां की ममता है बड़ी दुर्लभ ।
नैन भिगो देखें धरती नभ ।।
दोहा, ,,,
बाबा साहब भीमराव,
मां को करते याद ।
मस्तक शूल की बीमारी,
मां को ले गई चाँद ।।
मेरा भीम अकेला होगा,
जब मैं जग छोडूंगी ।
सुत की सेवा कैसे होगी,
जब मैं मुह मोडूंगी ।।
चौपाई, , , ,,
आवागमन की सृष्टि सारी ।
देंहपात जब हुई महतारी ।।
रामजी राव की अखियाँ रोती ।
भीग पलक जीवन को खोती ।।
अठाराह सौ सन 96 घाती ।
रहि रहि पीटें बाबा छाती ।।
धरा धाम भव त्याग चली मां ।
सकल प्रीत अनुराग चली मां ।।
दोहा,,,,
माँ भीमा चिर निद्रा सोई,
रामजी राव लाचार ।
फुआ बिचारी मीरा बाई,
भीम का करे दुलार ।।
रैन दिवस पुत्रों के जैसे,
करती नित व्यवहार ।
शिक्षा दीक्षा की व्यवस्था,
प्रति क्षण रहे तैयार ।।
चौपाई, ,,,
शिक्षा की चढ़ी ऐसी लत मद ।
पावें एक से पांच प्रथम पद ।।
ममता की ओ पावन जननी ।
दे गई वर विद्या की मेदनी ।।
रैन दिवस करें विद्या अध्ययन ।
उमर हो गई पंद्रह श्रीमन ।।
इक नव वर्षीय कन्या प्यारी ।
गोर बदन छवि थी बड़ी न्यारी ।।
दोहा, ,,,
नाम रमाबाई था उनका,
हो गया भीम से ब्याह ।
ब्याह से शिक्षा न हुई धीमी,
और भी बढ़ गई चाह ।।
विद्या अध्ययन तप के जैसे,
परिश्रम आठों याम ।
रैन दिवस या संध्या काले,
ना लें भीम आराम ।।
चौपाई, , ,,
सन ओनइस सौ सात की शिक्षा ।
पास किये मैट्रिक की परीक्षा ।।
सया जी गायकवाड जो राजा ।
नगर बड़ौदा के पुखराजा ।।
भीमराव बाबा की प्रतिभा ।
देखि किये उसी क्षण प्रतिज्ञा ।।
सहज भाव सब खर्च निभाऊं ।
वचनबद्ध सदा तुझे पढ़ाऊं ।।
दोहा, ,,,
कुशाग्र बुद्धि मेधावी भीम,
जीत लिये हिरदय ।
सुगम हुई आगे की शिक्षा,
दूर हुआ सब भय ।
एलफिंस्टन कॉलेज से,
इंटर तक शिक्षा ।
आए थे वहां फर्स्ट बाबा,
पूर्ण हुई सैया इच्छा ।।
चौपाई,,,,,
सन ओनइस सौ आठ सुहाना ।
पुत्र विभव से मन हरसाना ।।
सतरह वर्षीय भीम हरषि उर ।
जनमेंहु पुत्र रतन गंगाधर ।।
रत्न मणि मन हिया हुलासे ।
सौभाग्य पुष्प हृदय को सुहासे ।। जल बरसेंउ सावन झमाझम ।
भीम कहें पिता बन गये हम ।।
दोहा, ,,,,
पुत्र रत्न न दे सका,
ज्यादा दिन खुशियां ।
कुछ ही दिन में सो गया,
चिर निद्रा की निदिया ।।
दूजे सुत का जन्म हुआ,
बारह दिसंबर शाम ।
यशवंत राव नाम शुभ,
स्वस्थ मस्त अभिराम ।।
चौपाई, ,,,
सन ओनइस सौ बारह प्यारा ।
नजर लगे ना राज दुलारा ।।
मातु रमा बहु जतन जुटावें ।
सुबह शाम ईश्वर से मनावे ।।
मारे शिशु सुंदर किलकारी ।
नारि रमा सरवस उर हारी ।।
मन्द मन्द भीमइ ले मुसकी ।
नजर लगे ना रमा दे घुडकी ।।
दोहा, ,,,
सुत गंगाधर मृत्यु बाद,
पैदा हुए सुत तीन ।
नाम रमेश, राजरतन व,
इंदु सुता ब्रह्म लीन ।।
फर्स्ट श्रेणी मैट्रिक इंटर,
पास किये जब भीम ।
बंबई यूनिवर्सइटी जा,
बी ए,किये तब भीम ।।
चौपाई, ,,,,
गये कोलंबिया यू एस बाबा ।
लिए दाखिला देश के आभा ।।
एम ए फर्स्ट किये जिज्ञासु ।
मगन मुदित सब भारतवासी ।।
सन ओनइस सौ 16 आया ।
दुसरा एमए मन मुस्काया ।
सन ओनइस सौ 17 साक्षी ।
पीएचडी किये विधि आकांक्षी ।।
दोहा, ,,,
लंदन आप इकोनॉमिक्स,
अध्ययनरत बाबा भीम ।
डीएससी की लिए उपाधि,
खुशियां मिली असीम ।।
प्रतिभाशाली साहसी वे,
कर्तव्य पथ के पथिक ।
शिक्षाविद वा अर्थशास्त्री,
आन बान स्वास्तीक ।।
चौपाई, ,,,
डीएससी की लीन्ह उपाधि ।
गए जर्मनी ज्ञान के आंधी ।।
बर्लिंन विश्वाविद्यालय जाके ।
अध्ययनरत हुऎ ध्यान लगाके ।।
लेकिन डिग्री वहाँ न लीन्हा ।
लंदन में जा थीसिस कीन्हा ।
डिग्री सब कानून की पाए ।
पूर्ण एलएलबी कोर्स पुराये ।।
दोहा, ,,,
सन ओनइस सौ सताइस,
लंदन भाव विभोर ।
विधि डिग्री दे लंदन बोला,
बाबा तुम चित चोर ।।
खुशी में नैना छलक उठा,
मेहनत कुछ साकार ।
अन्न जल की न लें सुधिया,
अध्ययन पारावार ।।
चौपाई, , ,
अर्थशास्त्र विज्ञान की जोती ।
राजनीति इतिहास के मोती ।
पढ़ लिख हुऎ महान तेजस्वी ।
विश्व में दुर्लभ भीम यशस्वी ।।
विद्या निधि शिक्षाविद प्रखर ।
शूद्र ज्योति हों जैसे घर-घर ।।
घृणा जाति की पी पी घूटी ।
बनि गए भीम सजीवन बूटी ।।
दोहा, , ,,
दलित समाज की देख दशा,
बाबा भीम बेचैन ।
रेन दिवस सदा जागि जागि,
पुस्तक से लें चैन ।।
सन ओनइस सौ तेइस ईस्वी,
आ गए हिंदुस्तान ।
मुंबई में किए शुरू वकालत,
विधि ज्ञाता विद्वान ।।
लेखक परिचय
![]() |
| लेखक: केदारनाथ भारतीय (भुवाल) हिंदी साहित्यकार, कवि एवं लेखक |
केदारनाथ भारतीय हिंदी के साहित्यकार, कवि एवं चिंतक हैं। उनकी रचनाओं में सामाजिक चेतना, मानवीय मूल्य, राष्ट्रप्रेम और प्रेरणादायक विचारों का सुंदर समन्वय देखने को मिलता है। उन्होंने कविता, कहानी तथा अन्य साहित्यिक विधाओं के माध्यम से समाज को जागरूक करने का सतत प्रयास किया है।
"डॉ. भीमराव अंबेडकर का संघर्ष" उनकी एक प्रेरणादायक काव्य-श्रृंखला है, जिसमें डॉ. भीमराव अंबेडकर के जीवन, संघर्ष, विचारों और सामाजिक योगदान को काव्यात्मक रूप में प्रस्तुत किया गया है।
पाठकों से निवेदन है कि...
यदि आपको "डॉ. भीमराव अंबेडकर का संघर्ष – प्रथम चरण : वंदना" पसंद आया हो, तो कृपया नीचे अपनी टिप्पणी (Comment) अवश्य लिखें। आपकी राय हमारे लिए अत्यंत मूल्यवान है और हमें बेहतर साहित्य प्रस्तुत करने की प्रेरणा देती है।
यदि यह रचना आपको प्रेरणादायक लगी हो, तो इसे अपने मित्रों, परिवार और सोशल मीडिया पर Share करें, ताकि अधिक से अधिक लोग इस काव्य-श्रृंखला तक पहुँच सकें।
यदि आप केदारनाथ भारतीय की ऐसी ही मौलिक कविताएँ, कहानियाँ और साहित्यिक रचनाएँ पढ़ना चाहते हैं, तो हमारे ब्लॉग को Follow/Subscribe करना न भूलें।
आपके स्नेह, सहयोग और आशीर्वाद के लिए हार्दिक धन्यवाद।
आधिकारिक स्रोत: भारत का राष्ट्रीय पोर्टल


टिप्पणियाँ
एक टिप्पणी भेजें
कृपया अपनी राय साझा करें, लेकिन सम्मानजनक भाषा का प्रयोग करें।