मानव से महामानव (दोहावली हिंदी कविता) मानव से महामानव ध्रुव, कोटि कोटि बंदन । जाति अछूत के उद्धारक, भारत भूमि के चंदन ।। युग युग में बिरले ही आते, आपके जैसे प्राण । शिक्षा की डिग्री भी नर्वस, जाति सवर्ण में त्राण ।। संविधान के प्राण विधाता, ब्रह्म निकेतन चाँद । आप धरा पर यदि ना आते, न जाता मनुवाद ।। खत्म न होती जाति प्रथा, व्यथा गुलामी टीस । खत्म ना होती बंधुवा श्रम, मार बदन पग शीश ।। नमन...
मानव से महामानव ध्रुव,
कोटि कोटि बंदन ।
जाति अछूत के उद्धारक,
भारत भूमि के चंदन ।।
युग युग में बिरले ही आते,
आपके जैसे प्राण ।
शिक्षा की डिग्री भी नर्वस,
जाति सवर्ण में त्राण ।।
संविधान के प्राण विधाता,
ब्रह्म निकेतन चाँद ।
आप धरा पर यदि ना आते,
न जाता मनुवाद ।।
खत्म न होती जाति प्रथा,
व्यथा गुलामी टीस ।
खत्म ना होती बंधुवा श्रम,
मार बदन पग शीश ।।
नमन मनीषी रत्न वतन के,
नमन अनंत कर जोड़ ।
शिक्षाविद अति विद्या विमल,
बंदन भूं चहु ओर ।।
केदारनाथ भारतीय (भुवाल भारतीय)
केदार नाथ भारतीय (भुवाल भारतीय) एक संवेदनशील लेखक और कवि हैं, जो अपनी कलम के माध्यम से समाज की सच्चाइयों और मानवता के मूल्यों को सामने लाने का प्रयास करते हैं। ‘Kedar Ki Kalam’ के जरिए वे लोगों तक प्रेरणात्मक विचार पहुंचा रहे हैं।
👉 अगर आपको यह कविता ‘मानव से महामानव’ पसंद आई हो, तो इसे शेयर करें और अपने विचार कमेंट में जरूर बताएं।
ऐसे ही प्रेरणात्मक विचार और कहानियों के लिए हमारे ब्लॉग से जुड़े रहें।

टिप्पणियाँ
एक टिप्पणी भेजें
कृपया अपनी राय साझा करें, लेकिन सम्मानजनक भाषा का प्रयोग करें।