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आज की विशेष कहानी

युद्ध के परिणाम – जब ईरान पर हमले की खबर से मच गई अफ़रा-तफ़री | एक दर्दनाक कहानी

  युद्ध के परिणाम – एक दिल दहला देने वाली युद्ध कहानी | केदार की कलम ।। युद्ध के परिणाम ।।  वह पहाड़ी क्षेत्र निर्जन स्थान था, दूर दूर तक हजार हजार किलोमीटर चतुर्दिक सन्नाटा,अग्निपात में काल कवलित देहपातों की दुर्गंधे, चतुर्दिक मरघट जैसी वीरानिया । अभी दो सप्ताह पहले ही यहां पर ऊंची ऊंची गगनचुंगी अटारिया थी, महले दस महले लहरा रहे थे, बच्चों की किलकारियां गूंज रही थी ।  क्रिकेट और फुटबॉल के स्टेडियम बने हुए थे, बच्चे मैच खेलते थे,बच्चे फुटबॉल खेलते थे किंतु अब,अब वहां मानव रहित बस्तियां थी जहाँ पर लावारिस जैसी घायल अवस्था लिए चारों तरफ से मुड़ी तुड़ी,कण कण छलनी हुई, जगह-जगह दरारे और खाईयां बनी हुई, स्थान स्थान पर मानव लोथड़े लुढ़के हुए,कहीं कहीं युद्ध होलिका की ज्वलंत चिंगारियां धूं–धूं करके जलती हुई दूर-दूर तक दिखाई पड़ रही थी ।  वसुंधरा का रक्त रंजित कलेवर चारों तरफ से भस्मीभूत हो रहा था । जहाँ उसके कण कण में समाहित हृदय विदारक चीखों में डूबी हुई अकल्पनीय दारुणता से तिरोहित मार्मिक दृश्य,अपनी असीम वेदनाओं की सबूतें दे रही थी ।  जिसका मूल कारण,एक दूसरे देशों...

युद्ध के परिणाम – जब ईरान पर हमले की खबर से मच गई अफ़रा-तफ़री | एक दर्दनाक कहानी

 
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युद्ध के परिणाम – एक दिल दहला देने वाली युद्ध कहानी | केदार की कलम

।। युद्ध के परिणाम ।। 

वह पहाड़ी क्षेत्र निर्जन स्थान था, दूर दूर तक हजार हजार किलोमीटर चतुर्दिक सन्नाटा,अग्निपात में काल कवलित देहपातों की दुर्गंधे, चतुर्दिक मरघट जैसी वीरानिया । अभी दो सप्ताह पहले ही यहां पर ऊंची ऊंची गगनचुंगी अटारिया थी, महले दस महले लहरा रहे थे, बच्चों की किलकारियां गूंज रही थी । 

क्रिकेट और फुटबॉल के स्टेडियम बने हुए थे, बच्चे मैच खेलते थे,बच्चे फुटबॉल खेलते थे किंतु अब,अब वहां मानव रहित बस्तियां थी जहाँ पर लावारिस जैसी घायल अवस्था लिए चारों तरफ से मुड़ी तुड़ी,कण कण छलनी हुई, जगह-जगह दरारे और खाईयां बनी हुई, स्थान स्थान पर मानव लोथड़े लुढ़के हुए,कहीं कहीं युद्ध होलिका की ज्वलंत चिंगारियां धूं–धूं करके जलती हुई दूर-दूर तक दिखाई पड़ रही थी । 

वसुंधरा का रक्त रंजित कलेवर चारों तरफ से भस्मीभूत हो रहा था । जहाँ उसके कण कण में समाहित हृदय विदारक चीखों में डूबी हुई अकल्पनीय दारुणता से तिरोहित मार्मिक दृश्य,अपनी असीम वेदनाओं की सबूतें दे रही थी । 

जिसका मूल कारण,एक दूसरे देशों से हुए युद्धों का अत्यंत ही दुखद, महा भयानक एवं भयावह महा तांडव की प्रालनकारी विभीषिकाएँ । अति उत्पात की असीमित भोग विलासाओं,लिप्साओ में लिपटी हुई, क्रूर एवं हिंसक अभद्र हुंकारों में निमग्न,क्षण प्रतिक्षण प्रति स्पर्धाओ से तिरोहित,उद्दंडता का संगीन प्रमाण,जो मेरुदंड मेरुरज्जु,एवं नेत्र रेटिना श्लेष्मी झिल्ली को,पल भर में ही सुखा सुखाकर धूल धूसरित कर रेगिस्तान बनाने को आतुर हो उठे । 

वे नव दंपति अपने सात वर्षीय मासूम बच्चे अहमद खान को,अपने साथ लिए हुए कई दिनों के भूखे प्यासे जंगल की ओर भागे चले जा रहे थे, उनकी आंखों में महा भयानक भय, पीड़ा कराह एवं अपनों को खोने का दर्द,साफ साफ दिखाई पड़ रहा था । 

अजमल खान को अपने अब्बू रसीद खान और अपनी अम्मी नुसरत खान का स्मरण बार-बार राह चलते हो रहा था । उसके घर दूध का डेरी फार्म था, अब्बू अम्मी भी उसमें अपना पूरा सहयोग कर रहे थे । उसकी पत्नी नसरीन खान अपने मायके से अपने अब्बू जान तौफीक रजा खान से डेढ़ लाख रुपए उधारी ले आकर इस फॉर्म को चलवाई थी । दूध डेयरी फार्म का बिजनेस काफी दूर तक अपना विस्तार ले चुका था, परिवार में सभी खुश थे इकलौता लड़का अहमद पढ़ाई लिखाई में बड़ा ही तेज तर्रार था । परिश्रम संघर्ष और अच्छे लगन से घर में खुशियां ऐसे लहरा रही थी जैसे की आसमान में लहराता हुआ कोई ध्वज । 

किंतु यह खुशियां ज्यादा समय तक नहीं चल सकी, वह एक दिन पत्नी नसरीन खान को और बेटा अहमद खान को साथ लेकर किसी मार्केट में शॉपिंग करने के लिए चले गए । 

अचानक उन्हें खबर लगती है कि हमारे देश ईरान के ऊपर इसराइल और अमेरिका दोनों मिलकर आक्रमण करने वाले हैं, देखते ही देखते पूरे मार्केट में अफ़रा तफरी मच जाती है । भीड़ इधर-उधर भागने लगती है,अजमल खान अपनी बेगम नसरीन खान और बेटा अहमद का हाथ पकड़े हुए एक दिशा की तरफ भीड़ से निकलने का प्रयास करते हुए भागे । 

किसी तरह से वे लुक छिप कर भागते भागते एक पहाड़ी गुफा में जाकर शिफ्ट हो गये । 

वे वहाँ से तीसरे दिन जब घर वापस आये तो उनके सर के ऊपर जैसे आसमान ही टूट पड़ा हो, साँसे जैसे धोंकनी की तरह चलने लगीं हों, हृदय की गति पसलियों पर धाड़ धाड़ से बजने लगे हाँ, देखते ही देखते उनके मुंह से अचानक ही हृदय विदारक चीख फूट पड़ी । 

वे सब चारों तरफ दूर दूर तक अपने घर को ढूढ़ रहे थे, उनके आशियाने का कहीं अता पता नही था । चतुर्दिक सन्नाटो में तब्दील खंडहर ही खंडहर दिखाई पड़ रहे थे, कहीं-कहीं से मलबो के बीच से धुओं के गुबार उठ रहे थे, हवाओं के झोंकों के साथ मांस जलने की दुरगंधे आ रही थी । तभी आसमान में पुनः एक साथ कई लड़ाकू विमान मड़राते हुए दिखाई पड़े, वे तीनों घबराए, और फिर दूध से भरे हुए 20 लीटर का गैलन, अजमल खान अपने कंधों पर रखकर बेगम नसरीन खान एवं अहमद खान बेटे को साथ में लेकर जंगल की दिशा की तरफ भागा । 

जंगल में भटकते हुए उन तीनों को आज दसवां दिन था । 

उस भीषण जंगल में भी स्थान स्थान पर मिसाइलो के गिराये जाने के निशाने को देखकर वे तीनों भयभीत हो जा रहे थे । जंगल के बगल 10 बीघे की दूरी पर जब वे तीनों वहां पहुंचे तो उन्हें आश्चर्य का ठिकाना नहीं रहा,क्योंकि वहां कुछ दूरी पर खंडहर हुए ऊंची ऊंची इमारतो के मजबूत कंकाल, इत उत स्थानों पर ऐसे बिखरे हुए दृश्य प्रस्तुत कर रहे थे जैसे की उनके सुंदर और मासूम नाजुक संगमरमरी चिकने बदन पर, किसी ने बड़ी बेरहमी से बम बारूद और मिसाइलें दाग दी हों जो उन्हें बुरी तरह से क्षतिग्रस्त कर दिए । 

उस सुनसान खूबसूरत स्थान पर नगर निवासियों के नाम पर अब वहाँ केवल अपनी गिनती के मात्र तीन मनुष्य ही बचे हुए थे जिनकी संख्याएं पति पत्नी और एक खूबसूरत मासूम बेटे अहमद के रूप में थी । शायद वे तीनों बिना खाए पिए ही उस भीषण जंगल में अन्न जल की तलाश में निकले थे, या फिर दुश्मनों की मिसाइलें यहां तक नहीं पहुंचेंगी, हम यहां जंगल में सुरक्षित रहेंगे । 

उनके पास 20 लीटर का एक डिब्बा था जिसमें दूध भरा हुआ था, किंतु अब वह दूध भी समाप्ति के कगार पर मुंह लटकाए हुए निरीह भाव में डिब्बै की पेंदी में पड़ा उनके कंधों पर झूल रहा था । 

बेचारे अजमल खान का बुरा हाल था वे अपनी बेगम नसरीन खान और वह मासूम सा दिखने वाला बच्चा अहमद खान को संभाले हुए आगे की ओर बढ़ते चले जा रहे थे, जहां अब उन्हें कुछ जंगली वृक्षों के पत्तों को खोज कर उन्हें भोजन के रूप में ग्रहण करना था । बेचारी नसरीन, अब तो उससे चला भी नहीं किया जा रहा था क्योंकि आज वह दसवां दिन था जो अन्न जल का एक फांका भी उनके मुंह को नसीब नहीं हुआ था । और तो और वह ऐसी परिस्थिति में गर्भवती भी थी । इधर प्यारा बेटा अहमद खान भी भले ही वह सात वर्ष का रहा हो किंतु उसके भीतर अकूत ऊर्जा भरी थी, वह अपने अब्बू अम्मी को ढाढस बधाते हुए आगे की ओर बढ़ता ही चला जा रहा था ।

उसके अब्बू अम्मी उसके हौसले को देखकर आश्चर्यचकित हो रहे थे कि यह नन्हा सा हमारा लड़का हमारी हौसला अफजाई कर रहा है,हम दोनों पति-पत्नी के हौसले को बुलंद कर रहा है कौन कहे कि हम दोनों मिलकर अपने अहमद खान बेटे के हौसले की अफजाई करें । 

20 किलोमीटर की दूरी तय करने के बाद, वे तीनों अभी आराम करने के ही फिराक में थे कि अचानक आसमान से मिसाइलो की गड़गड़ाहटें गूंज उठी । 

पल भर में ही वहां की संपूर्ण धरती कम्पायमान होती चली गई,और वे तीनों मासूम,,,,।

                               केदारनाथ नागेंद्र भारतीय

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युद्ध के परिणाम – एक भावनात्मक युद्ध कहानी | लेखक केदारनाथ भारतीय उर्फ भुवाल भारतीय


युद्ध के परिणाम भाग 2: जब घर लौटे तो सब कुछ बदल चुका था

।। युद्ध के परिणाम ।। 
                    ।। भाग दो ।। 
                ,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,, 

अजमल खान अपने मासूम बेटे को बड़े ही मासूमियत से निहारते हुए उसके माथे को चूम कर अपनी गोदो में भरते हुए वही चुपके से नसरीन बानों के साथ बैठ गए,कि तभी उन्हें अचानक एक ही सुर में भांति भांति चीखो पुकार की त्वरित ध्वनियां, करुण क्रंदन के नाद में डूबी हुई आर्त्तनाद का स्वर भेदन देने लगी । 

अजमल खान को प्रतीत हुआ कि यही कुछ दूरी पर किसी सुनसान स्थान पर बने मदरसे के ऊपर ये मिसाइले गिरी है, हम सभी के लिए यह स्थान भी सुरक्षित नहीं है,अतः अब हमें यहाँ से अपने मामू के घर चले जाना चाहिए क्योंकि हमारे मामू का घर यहां से अब ज्यादा दूर नहीं है, ऐसा सोचते हुए वह चुपके से उठकर अपनी बेगम नसरीन खान को साथ में लेकर चलते बने । 

चलते चलते वे तीनों ही थक हारकर चूर हो गए थे । अब उनसे आगे चला नहीं किया जा रहा था, दूध का खाली गैलन वे पहले ही फेक चुके थे, भूख प्यास के साथ जीवन को जीना उनकी एक मजबूरी बन चुकी थी । किंतु आगे के लिए अब यह जीवन जीना असंभव ही असंभव था । लाडले अहमद भी अब पूरी तरह से थेथर् हो चुके थे, उनसे अब बिल्कुल भी चला नहीं किया जा रहा था,अम्मी बेगम नसरीन बानो का भी यही हाल था, अब्बू जान अजमल खान भी तो अपनी सुधिया कब की भूल चुके थे, वे अपनी बदी कहे तो किससे कहें । 

बिचारे किसी तरह से चलकर, वे ऊचे पहाड़ के नीचे तराई भाग के सघन वन्य क्षेत्र में जाकर खड़े हुए थे । पहाड़ काफी ऊंचा था उन्हें नीचे से चढ़ाई चढ़कर उस पहाड़ पर जाना था जहाँ उनके मामू बशीर खान का घर पड़ता था, अफसोस कि यह कार्य बड़ा ही असंभव था । 

तभी उस नन्हे अहमद की फसी फसी आवाज सुनकर अब्बू अम्मी के होश फाख्ता होते चले गए ।
मुन्ना मुन्ना तुझे क्या हुआ, हे अल्लाह मेरे मुन्ना को क्या हुआ, यह बोलते बोलते क्यों नहीं बोल पा रहा है । 
अजमल खान अपनी गोदों में अपने प्यारे बेटे अहमद को लेकर चीखने चिल्लाने लगे थे, उन दोनों की हालत देखकर नसरीन बानो खान को जैसे होश ही ना रहा हो,तभी अहमद के मुंह से स्वर फूटे । 

अब्बू अम्मी,मुझे बहुत जोरों से प्यास लगी है मेरा गला सूख चुका है, पानी यहां दूर-दूर तक कहीं नहीं मिल पाएगा । मेरी चिंता मत करना अब्बू अम्मी जान, अल्लाह बहुत बड़ा है क्या यह युद्ध अल्लाह की मर्जी सो रहा है, या कुछ जालिम काफिरों के कारण । युद्ध करना तो सरल होता है अब्बू अम्मी, किंतु उसके परिणाम को भोगना,यह सरल नहीं होता । 

बेटे तुम सही कह रहे हो, किंतु इस समय हम खतरे में हैं हम मामू के घर चलकर आराम से बातें करेंगे । 

अजमल ने ऐसा कहकर अपने गमछे से अहमद को अपनी पीठ पर कसकर बांधते हुए नसरीन बानो को भी उसी के दुपट्टे से अपने कमर को बांधकर उस भारी भरकम पहाड़ की चोटी पर चढ़ने के लिए तैयार हो गया, कहते हैं कभी-कभी डर भय के कारण इंसान का साहस भी हजार गुना बढ़ जाता है, जैसा कि अजमल खान के साथ चरितार्थ होने के लिए तत्पर है । 

मुन्ना तुम घबराना मत, देखना अभी हम इस पहाड़ पर चढ़कर अपने मामू के घर पहुंच चलेंगे तब हमारे सारे संकट दूर हो जाएंगे, नसरीन तुम अपना ख्याल रखना, या अल्लाह, ,, 
ऐसा कहते हुए अजमल खान ऊंचे पहाड़ की चढ़ाई चढ़ना शुरू कर दिये, धीरे-धीरे अभी वे कुछ ही दूरी चढ़ाई चढ़े होंगे कि वह नन्हा बच्चा अहमद धीरे से बोल पड़ा । 

अब्बू मम्मी, क्या आप दोनों को पता है कि आज रमजान के इस पावन पवित्र महीने में जुम्मे की तीसरी नमाज है,क्या आप दोनों ने नमाज़ अता की,नहीं की ना, चलो कोई बात नहीं अल्लाह हमारी मुसीबत देख रहे है । 
हम खुशनसीब हैं बेटा,जो तुम जैसा लाल मुझे अल्लाह ने बक्सा है,खैर कोई बात नही,परवरदिगार से कहो कि वह हमेँ सही सलामत इस पहाड़ी की चढ़ाई चढ़ा कर मामू के घर तक पहुंचा दे । 

ओ तो ठीक है अब्बू जान, अल्लाह जब भी कोई इंतजाम करता है तो हम बंदों के लिए वह कभी भी गलत इंतजाम नहीं करता । वैसे अब्बू एक बात कहूं, वह यह कि सारी दुनिया में यदि कहीं भी मानवता जिंदी है तो वह है सबसे पहले भारतवर्ष,जहां पर अनेकता में भी एकता का पूर्ण समावेश होता है, सत्य अहिंसा प्रेम, बलिदान त्याग और भाईचारा के जहां गली गली नुक्कड़ नुक्कड़ गीत गाए जाते हैं, क्या इस बात को आप दोनों मानते हो अब्बू अम्मी ।

सच्चाई को तो सिर्फ अभिमान अहंकार और बेईमान ही झूठा मानते, हैं । बेटे मेरा सारा शरीर थक चुका है मैं कैसे चढ़ाई चढ़ रहा हूं यह अल्लाह ही जाने, उनका ही करिश्मा कहा जा सकता है, ऐसे समय में हम झूठ कैसे बोल सकते हैं, वास्तव में हिंदुस्तान अच्छा देश है । 

कि तभी उस नीले आसमान में हेलीकॉप्टर के आने की आवाजे सुनाई पड़ी, वे तीनों वहीं डर के मारे थरथर कांपने लगे । पलक झपकते ही हेलीकॉप्टर उनके सर पर गिद्धों की भांति मड़राने लगा, उन्हें काटो तो खून नहीं वे वही बाबुल के पेड़ को जो पहाड़ की चट्टानों से सटा हुआ था उसे पड़कर उस हेलीकॉप्टर को देखने लगे थे।

हेलीकॉप्टर धीरे-धीरे उनके करीब आकर उनके ऊपर रस्सी फ़ेका, फिर माइक से अनाउंस करते हुए उन्हें संतोषजनक हिदायत देकर रस्सी को पकड़ने के लिए कहा, किंतु अजमल ने उनकी बातों को अनसुनी करते हुए अहमद से पूछा, बेटा इस हेलीकॉप्टर में क्या लिखा है, अरे हाँ इसमें तो इंडियन लिखा है, बेटा क्या हमें इस रस्सी को पकड़ लेना चाहिए, 
अब्बू अगर हेलीकॉप्टर में इंडियन लिखा है तो हमें अवश्य ही अल्लाह का नाम लेकर रस्सी पकड़ लेना चाहिए, लगता है वे हमारी मदद करने के लिए आए हैं । 

ठीक है बेटा हम रस्सी पकड़ते हैं, या अल्लाह, ,, 
अजमल खान ने रस्सी को जैसे ही मजबूती के साथ पकड़े हेलीकॉप्टर ने उन्हें अपनी ओर पलक झपकते ही खींच कर हेलीकॉप्टर में बैठा लिया और क्षण मात्र में ही वह हेलीकॉप्टर गगनचुंबी होता चला गया । 

अभी हेलीकॉप्टर के उड़े चंद मिनट भी नहीं हुए थे कि अचानक बशीर खान मामू के आलीशान इमारत पर मिसाइलो की बौछार होने लगी, देखते ही देखते सारी बस्तियों के परखच्चे उड़ गए, ज्वालामुखी के इस धड़कते हुए भंडारण में कितनी मानव प्रजातियां जलकर राख हो गई, यह प्रक्रिया गणनाओं से परे है । 
अतः युद्ध के परिणाम कभी भी किसी पक्ष के लिए हितकर नहीं होते, इसलिए हमें किसी भी समस्याओं का समाधान करने हेतु, युद्ध नहीं, संवाद चाहिए, संवाद । 

     ।। इति श्री ।।
          केदारनाथ नागेंद्र भारतीय

कलिंग युद्ध के बाद सम्राट अशोक ने जब रणभूमि में बिखरी लाशें, रोते हुए बच्चे, उजड़े घर और समाप्त होती मानवता को देखा, तब उन्हें समझ में आया कि युद्ध कभी भी किसी के लिए विजय नहीं लाता, वह केवल विनाश देता है।

आज भी जब दुनिया के अलग-अलग देशों में युद्ध की आग भड़कती है, तो मरता कोई एक सैनिक नहीं, बल्कि पूरी मानवता घायल होती है। घर टूटते हैं, परिवार बिछड़ते हैं, और इंसानियत हार जाती है।

युद्ध के परिणाम हमेशा दुख, भय और पश्चाताप ही देते हैं। इसलिए समय आ गया है कि संसार सम्राट अशोक की तरह यह सत्य स्वीकार करे कि शक्ति का सबसे बड़ा रूप हथियार नहीं, बल्कि संवाद है।

यदि समस्याओं का समाधान बातचीत से हो सकता है, तो युद्ध मानवता के साथ सबसे बड़ा अन्याय है।

आओ संकल्प लें —
युद्ध नहीं, संवाद चाहिए।
विनाश नहीं, मानवता चाहिए।

— केदारनाथ भारतीय उर्फ भुवाल भारतीय
केदार की कलम

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