
युद्ध के परिणाम – एक दिल दहला देने वाली युद्ध कहानी | केदार की कलम

।। युद्ध के परिणाम ।।
वह पहाड़ी क्षेत्र निर्जन स्थान था, दूर दूर तक हजार हजार किलोमीटर चतुर्दिक सन्नाटा,अग्निपात में काल कवलित देहपातों की दुर्गंधे, चतुर्दिक मरघट जैसी वीरानिया । अभी दो सप्ताह पहले ही यहां पर ऊंची ऊंची गगनचुंगी अटारिया थी, महले दस महले लहरा रहे थे, बच्चों की किलकारियां गूंज रही थी ।
क्रिकेट और फुटबॉल के स्टेडियम बने हुए थे, बच्चे मैच खेलते थे,बच्चे फुटबॉल खेलते थे किंतु अब,अब वहां मानव रहित बस्तियां थी जहाँ पर लावारिस जैसी घायल अवस्था लिए चारों तरफ से मुड़ी तुड़ी,कण कण छलनी हुई, जगह-जगह दरारे और खाईयां बनी हुई, स्थान स्थान पर मानव लोथड़े लुढ़के हुए,कहीं कहीं युद्ध होलिका की ज्वलंत चिंगारियां धूं–धूं करके जलती हुई दूर-दूर तक दिखाई पड़ रही थी ।
वसुंधरा का रक्त रंजित कलेवर चारों तरफ से भस्मीभूत हो रहा था । जहाँ उसके कण कण में समाहित हृदय विदारक चीखों में डूबी हुई अकल्पनीय दारुणता से तिरोहित मार्मिक दृश्य,अपनी असीम वेदनाओं की सबूतें दे रही थी ।
जिसका मूल कारण,एक दूसरे देशों से हुए युद्धों का अत्यंत ही दुखद, महा भयानक एवं भयावह महा तांडव की प्रालनकारी विभीषिकाएँ । अति उत्पात की असीमित भोग विलासाओं,लिप्साओ में लिपटी हुई, क्रूर एवं हिंसक अभद्र हुंकारों में निमग्न,क्षण प्रतिक्षण प्रति स्पर्धाओ से तिरोहित,उद्दंडता का संगीन प्रमाण,जो मेरुदंड मेरुरज्जु,एवं नेत्र रेटिना श्लेष्मी झिल्ली को,पल भर में ही सुखा सुखाकर धूल धूसरित कर रेगिस्तान बनाने को आतुर हो उठे ।
वे नव दंपति अपने सात वर्षीय मासूम बच्चे अहमद खान को,अपने साथ लिए हुए कई दिनों के भूखे प्यासे जंगल की ओर भागे चले जा रहे थे, उनकी आंखों में महा भयानक भय, पीड़ा कराह एवं अपनों को खोने का दर्द,साफ साफ दिखाई पड़ रहा था ।
अजमल खान को अपने अब्बू रसीद खान और अपनी अम्मी नुसरत खान का स्मरण बार-बार राह चलते हो रहा था । उसके घर दूध का डेरी फार्म था, अब्बू अम्मी भी उसमें अपना पूरा सहयोग कर रहे थे । उसकी पत्नी नसरीन खान अपने मायके से अपने अब्बू जान तौफीक रजा खान से डेढ़ लाख रुपए उधारी ले आकर इस फॉर्म को चलवाई थी । दूध डेयरी फार्म का बिजनेस काफी दूर तक अपना विस्तार ले चुका था, परिवार में सभी खुश थे इकलौता लड़का अहमद पढ़ाई लिखाई में बड़ा ही तेज तर्रार था । परिश्रम संघर्ष और अच्छे लगन से घर में खुशियां ऐसे लहरा रही थी जैसे की आसमान में लहराता हुआ कोई ध्वज ।
किंतु यह खुशियां ज्यादा समय तक नहीं चल सकी, वह एक दिन पत्नी नसरीन खान को और बेटा अहमद खान को साथ लेकर किसी मार्केट में शॉपिंग करने के लिए चले गए ।
अचानक उन्हें खबर लगती है कि हमारे देश ईरान के ऊपर इसराइल और अमेरिका दोनों मिलकर आक्रमण करने वाले हैं, देखते ही देखते पूरे मार्केट में अफ़रा तफरी मच जाती है । भीड़ इधर-उधर भागने लगती है,अजमल खान अपनी बेगम नसरीन खान और बेटा अहमद का हाथ पकड़े हुए एक दिशा की तरफ भीड़ से निकलने का प्रयास करते हुए भागे ।
किसी तरह से वे लुक छिप कर भागते भागते एक पहाड़ी गुफा में जाकर शिफ्ट हो गये ।
वे वहाँ से तीसरे दिन जब घर वापस आये तो उनके सर के ऊपर जैसे आसमान ही टूट पड़ा हो, साँसे जैसे धोंकनी की तरह चलने लगीं हों, हृदय की गति पसलियों पर धाड़ धाड़ से बजने लगे हाँ, देखते ही देखते उनके मुंह से अचानक ही हृदय विदारक चीख फूट पड़ी ।
वे सब चारों तरफ दूर दूर तक अपने घर को ढूढ़ रहे थे, उनके आशियाने का कहीं अता पता नही था । चतुर्दिक सन्नाटो में तब्दील खंडहर ही खंडहर दिखाई पड़ रहे थे, कहीं-कहीं से मलबो के बीच से धुओं के गुबार उठ रहे थे, हवाओं के झोंकों के साथ मांस जलने की दुरगंधे आ रही थी । तभी आसमान में पुनः एक साथ कई लड़ाकू विमान मड़राते हुए दिखाई पड़े, वे तीनों घबराए, और फिर दूध से भरे हुए 20 लीटर का गैलन, अजमल खान अपने कंधों पर रखकर बेगम नसरीन खान एवं अहमद खान बेटे को साथ में लेकर जंगल की दिशा की तरफ भागा ।
जंगल में भटकते हुए उन तीनों को आज दसवां दिन था ।
उस भीषण जंगल में भी स्थान स्थान पर मिसाइलो के गिराये जाने के निशाने को देखकर वे तीनों भयभीत हो जा रहे थे । जंगल के बगल 10 बीघे की दूरी पर जब वे तीनों वहां पहुंचे तो उन्हें आश्चर्य का ठिकाना नहीं रहा,क्योंकि वहां कुछ दूरी पर खंडहर हुए ऊंची ऊंची इमारतो के मजबूत कंकाल, इत उत स्थानों पर ऐसे बिखरे हुए दृश्य प्रस्तुत कर रहे थे जैसे की उनके सुंदर और मासूम नाजुक संगमरमरी चिकने बदन पर, किसी ने बड़ी बेरहमी से बम बारूद और मिसाइलें दाग दी हों जो उन्हें बुरी तरह से क्षतिग्रस्त कर दिए ।
उस सुनसान खूबसूरत स्थान पर नगर निवासियों के नाम पर अब वहाँ केवल अपनी गिनती के मात्र तीन मनुष्य ही बचे हुए थे जिनकी संख्याएं पति पत्नी और एक खूबसूरत मासूम बेटे अहमद के रूप में थी । शायद वे तीनों बिना खाए पिए ही उस भीषण जंगल में अन्न जल की तलाश में निकले थे, या फिर दुश्मनों की मिसाइलें यहां तक नहीं पहुंचेंगी, हम यहां जंगल में सुरक्षित रहेंगे ।
उनके पास 20 लीटर का एक डिब्बा था जिसमें दूध भरा हुआ था, किंतु अब वह दूध भी समाप्ति के कगार पर मुंह लटकाए हुए निरीह भाव में डिब्बै की पेंदी में पड़ा उनके कंधों पर झूल रहा था ।
बेचारे अजमल खान का बुरा हाल था वे अपनी बेगम नसरीन खान और वह मासूम सा दिखने वाला बच्चा अहमद खान को संभाले हुए आगे की ओर बढ़ते चले जा रहे थे, जहां अब उन्हें कुछ जंगली वृक्षों के पत्तों को खोज कर उन्हें भोजन के रूप में ग्रहण करना था । बेचारी नसरीन, अब तो उससे चला भी नहीं किया जा रहा था क्योंकि आज वह दसवां दिन था जो अन्न जल का एक फांका भी उनके मुंह को नसीब नहीं हुआ था । और तो और वह ऐसी परिस्थिति में गर्भवती भी थी । इधर प्यारा बेटा अहमद खान भी भले ही वह सात वर्ष का रहा हो किंतु उसके भीतर अकूत ऊर्जा भरी थी, वह अपने अब्बू अम्मी को ढाढस बधाते हुए आगे की ओर बढ़ता ही चला जा रहा था ।
उसके अब्बू अम्मी उसके हौसले को देखकर आश्चर्यचकित हो रहे थे कि यह नन्हा सा हमारा लड़का हमारी हौसला अफजाई कर रहा है,हम दोनों पति-पत्नी के हौसले को बुलंद कर रहा है कौन कहे कि हम दोनों मिलकर अपने अहमद खान बेटे के हौसले की अफजाई करें ।
20 किलोमीटर की दूरी तय करने के बाद, वे तीनों अभी आराम करने के ही फिराक में थे कि अचानक आसमान से मिसाइलो की गड़गड़ाहटें गूंज उठी ।
पल भर में ही वहां की संपूर्ण धरती कम्पायमान होती चली गई,और वे तीनों मासूम,,,,।
केदारनाथ नागेंद्र भारतीय
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| युद्ध के परिणाम – एक भावनात्मक युद्ध कहानी | लेखक केदारनाथ भारतीय उर्फ भुवाल भारतीय |
युद्ध के परिणाम भाग 2: जब घर लौटे तो सब कुछ बदल चुका था
कलिंग युद्ध के बाद सम्राट अशोक ने जब रणभूमि में बिखरी लाशें, रोते हुए बच्चे, उजड़े घर और समाप्त होती मानवता को देखा, तब उन्हें समझ में आया कि युद्ध कभी भी किसी के लिए विजय नहीं लाता, वह केवल विनाश देता है।
आज भी जब दुनिया के अलग-अलग देशों में युद्ध की आग भड़कती है, तो मरता कोई एक सैनिक नहीं, बल्कि पूरी मानवता घायल होती है। घर टूटते हैं, परिवार बिछड़ते हैं, और इंसानियत हार जाती है।
युद्ध के परिणाम हमेशा दुख, भय और पश्चाताप ही देते हैं। इसलिए समय आ गया है कि संसार सम्राट अशोक की तरह यह सत्य स्वीकार करे कि शक्ति का सबसे बड़ा रूप हथियार नहीं, बल्कि संवाद है।
यदि समस्याओं का समाधान बातचीत से हो सकता है, तो युद्ध मानवता के साथ सबसे बड़ा अन्याय है।
आओ संकल्प लें —
युद्ध नहीं, संवाद चाहिए।
विनाश नहीं, मानवता चाहिए।
— केदारनाथ भारतीय उर्फ भुवाल भारतीय
केदार की कलम

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