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| हरि सोचो से काज बने, हरि बिन काज न होय —हिंदी कविता |
अमृतवाणी हिंदी कविता
आपनु सोचा होवे न,
हरि सोचा सब होय ।
हरि सोचो से काज बने,
हरि बिन काज न होय ।।
बृहद बड़ावन संपदा,
अपना कह बौराय ।
अपना तो हरि से हरा,
अपना कहां दिखाय ।।
लाभे लाभ मन पिरोये,
मन से माया टेर ।
मन में माया मिढ़ गया,
झंझावत का ढेर ।।
क्षन क्षन झूमे तरुवर पाती,
नभ से बरसे मेघ ।
क्षन क्षन बदले सृष्टि दरपन,
जिसमें हरि का भेष ।।
समय से पहले प्रकृति प्यारी,
कभी न ले विस्तार ।
समय से पहले आना-जाना,
संभव नहीं संस्सर ।।
केदारनाथ भारतीय उर्फ भुवाल भारतीय
जीवन में कई बार हम अपनी सोच और योजनाओं में उलझ जाते हैं, लेकिन सच्चाई यह है कि हर कार्य भगवान की इच्छा से ही पूर्ण होता है।
यह भावपूर्ण कविता हमें हरि पर विश्वास रखने का संदेश देती है।
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लेखक: केदारनाथ भारतीय (भुवाल भारतीय)
प्रस्तुति: नागेंद्र भारतीय

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