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आज की विशेष कहानी

दुख ही दुख की भाषा समझे कविता | केदारनाथ भारतीय उर्फ भुवाल भारतीय

कविता – दुख ही दुख की भाषा समझे   लेखक – केदारनाथ भारतीय उर्फ भुवाल भारतीय ।। दुख सुख ।।  कविता ।। दुःख तो सुख से न्यारा प्यारा,                प्रेम की गंगा धारा है ।  निश्चल आत्म हितैषी वाणी,                मन का राज दुलारा है । सबको याद है करता निशदिन,                मधुर मधुप रस घोलो से । दुख ही दुख की भाषा समझे,                मिलन करें मधु बोलो से ।।  दुख को देखें सुख जब भैया,                दुख से सुख कुछ दूर हटे ।  हंसी उड़ाए मुंह. बिचकाए,                हेय दृष्टि विष फुट पड़े ।।  सुख हिंसक निष्ठुर अति कामी,                 दयाहीन पाषाण अधम ।  व्यवहार निरंकुश निरा उदंडी,              ...

दोस्ती 2 |राम मनोहर का दुर्गम पथ ( हिंदी कहानी)

वैसे मेरा बेटा ही हरामखोर था जो पुलिस की नौकरी पाने के बाद भी मुझे गिफ्ट में ये कीपैड मोबाइल दे दिया है, क्या वह एंड्राइड मोबाइल नहीं दे सकता था,जिससे समाज में मेरी इज्जत और भी बढ़ जाती, किंतु वह ऐसा नहीं किया । 
पता नहीं कितने लोग मेरी इस छोटी सी मोबाइल को देखकर अपनी खीसें निपोरे होंगे,अपने मुंह को छिपा छिपा कर हसें होंगे, राम जाने मेरी उस समय उनके बीच में, कितनी फजीहत हुई होगी । 

यह कहानी केवल शब्दों का क्रम नहीं, बल्कि उन रिश्तों की गूंज है...आइए, इस दुर्गम पथ पर राम मनोहर के साथ चलें और दोस्ती के उस अर्थ को समझें जो हर मोड़ पर खुद को साबित करता है।
लेखक: केदार नाथ भारतीय उर्फ भुवाल भारतीय, उत्तर प्रदेश, प्रयागराज

धुंध भरी सड़क पर सर्द मौसम में एक वृद्ध व्यक्ति हाथ में कीपैड मोबाइल लिए खड़ा, अपने विचारों में डूबा हुआ
कुछ रिश्ते उपहार नहीं, संवेदनाएँ माँगते हैं।

।।दोस्ती।।

रात्रि के ठीक 8:00 बज चुके थे । अब वहां चतुर्दिक सन्नाटा, मरघट जैसी बीरानी, सुनसान पथ, चारों दिशाओं में गहन अंधकार का साम्राज्य था । रोड के दाएं बाएं ऊपर नीचे बड़े-बड़े पहाड़, झाड़ी झंख का विकराल वन्य क्षेत्र । कुहरों का लबादा ओढ़े हुए अठारी पठारी मार्ग भी, आज अपने ही सुंदर चेहरों पर भयावहता के कुरूप दृश्य समेटे बहुत ही हैरतअंगेज दिख रहे थे। 

कि तभी अचानक राम मनोहर पंढरपुरी की कीपैड मोबाइल, उनके पेंट की जेब में रखी हुई तीव्र आवाज के साथ घनघना उठी । शायद उनके मोबाइल पर किसी ने फोन लगाया था,किन्तु यह फोन उनकी मोबाइल पर पहली बार नहीं आया था, बल्कि इसके पहले और भी कितनी बार फोन आ चुका था, लेकिन उसे वे रिसीव नहीं किए थे, इसलिए की फोन पर बात करते समय सुनसान स्थान पर मेरी आवाज दूर-दूर तक जाएगी, हो सकता है कोई जंगली जानवर भी यहाँ आकर उन्हें परेशान कर सकता । 

वैसे भी उन्हें यह पहले से ही ज्ञात था कि यह फोन उनकी धर्मपत्नी रेणुका का होगा, क्योंकि इतनी रात गए उसके अलावा और कोई फोन नहीं लगा सकता था वह इसलिए कि उनके मोबाइल का नंबर और किसी के पास नहीं था, यदि किसी के पास था तो वह रामचंद्रन पंढरपुरी के पास ही था जो उसका अपना प्यारा दोस्त था,पर बीते हुए इन तीन सालों से उसका फोन उसकी मोबाइल पर एक बार भी नहीं आया था । और हाँ राम मनोहर पंढरपुरी अपनी मोबाइल से उसे कितनी बार कॉल किया था किंतु उसका नंबर हर बार कवर क्षेत्र के बाहर बता रहा था । कारण, या तो वह अपनी मोबाइल रिचार्ज ना कराया हो या फिर सिम कार्ड ही बदल दिया हो । 

जब भी वह कहीं बाहर होता था तो उसकी धर्मपत्नी रेणुका उसका हाल समाचार जानने के उसे बार बार फोन लगाकर परेशन करती थी। इसीलिए वह गुस्से में अपनी मोबाइल को अपने साथ बिल्कुल भी नहीं ले आना चाहता था, किंतु उसकी धर्मपत्नी रेणुका ने उसे जबरदस्ती दे दिया था । वह कुपित भाव में बड़ी मुश्किल से उस मोबाइल को घूरते हुए अपने पास रखा था । किंतु अभी उसका फोन बार बार आने पर वह अपना बुरा सा मुंह बनाते हुए उसे उठाया था । वह आहिस्ते से बोला,,, 
हेलो, ,,,,। 

दूसरी तरफ से उसकी पत्नी ने उसे दहाड़ मारी, हेलो, अजी सुनते हो फोन क्यों नहीं उठाते, बड़े बाहुबली हो गए हो क्या, हमारा फोन ना उठाओ ऐसी हिम्मत तुम्हारे अंदर कहां से आ गई । अच्छा तो ये बताओ कि इस समय आप कहां पर हो, क्या आप अपनी दीदी के घर पहुंच चुके हो । कितनी बार फोन लगाई हूं,कान में जूं तक नहीं रेंगा आपके । अब जाकर फोन रिसीव किये हो, क्या कोई बात हो गई थी क्या । 

वह थोड़ा अकड़ते हुए बोली थी, किंतु राम मनोहर पंढरपुरी उसकी ऐसी खरी खोटी को सुनते सुनते, अब पूरी तरह से अहदी हो चुके थे । अब उन्हें उसका व्यवहार बिल्कुल भी बुरा नहीं लगता था । क्योंकि इस प्रकार से बोलने की उसकी सब दिन की आदत हो चुकी थी । किन्तु वह चंचल चपल रेणुका दिल की लेसमात्र भी बुरी नहीं थी । 

राम मनोहर पंढरपुरी के अतीत में कुछ ऐसे ही हंसी मजाक के यादगारों के लम्हे थे जो कभी-कभी उनके जेहन में आ जाया करते थे। एक दिन वे अपनी धर्म पत्नी रेणुका से हंसी मजाक में यूं ही बोल पड़े थे कि,यदि मुझसे कोई कहे तो मैं एक बार नहीं बल्कि सौ सो बार जोरा जामा पहन कर अपने सर पर मौर बाधकर तुझसे ही नहीं मौका मिले तो किसी भी लड़की से शादी कर लूंगा,फिर भी मेरा दिल नहीं भरेगा । 

फिर क्या था रेणुका इतना सुनते ही गुस्से में लाल पीली हो गई, वह किसी घायल सिंहनी की भांति दहाड़ते हुए विफर पड़ी थी,अरे तू मेरे रहते हुए भी किसी दूसरे से अपनी शादी करेगा, वह भी सौ–सो बार,जो तैयार हो जाए उसी के साथ । ठीक है अब तू अपनी शादी कर ले,मैं तो चली अपने मायके, और हां आना भी नहीं धनवनतरी नगर, नहीं तो अपने भाइयों से कहकर तेरी गधों जैसी धुनाई कराऊंगी, और हां एक बात और,आज से तेरा मेरा का सारा रिस्ता यहीं से खत्म, समझे।

इतना कहते ही वह अपने मायके का राह पकड़ ली थी । 
राम मनोहर पंढरपुरी जी उसे समझाने का बहुत प्रयास किए थे किंतु वह मानने वाली कहां थी, वह चल पड़ी तो चल पड़ी । 
बिचारे राम मनोहर पंढरपुरी, उसके आगे हाथ जोड जोड़कर गिड़गिड़ाने लगे थे, वो भावुकता वस भर्राये गले से बोले जा रहे थे ।

मैं तो यूं ही मजाक कर रहा था तुम हो कि बुरा मान गई, भला तुमसे सुंदर इस दुनिया में मेरे लिए और कौन है,मैं तुम्हारे बगैर एक पल भी नहीं जी सकता,तुम कहो तो मैं अभी अभी तुम्हारे सामने अपने दोनों कानों पकड़कर दंड बैठक करने लगू, तुम कहो तो अभी तुम्हारे सामने अपनी नाक जमीन पर रगड़ने लगूं, लेकिन तुम मुझे छोड़कर अपने मायके मत जाओ, मैं तुम्हारे सामने हाथ जोड़ता हूं । 

इतना कुछ सुनने के बाद तब जाकर वह मानी थी ।
अब वह उस सूनसान अंधेरी रात में किसी से भी बातें नहीं करना चाहता था, क्योंकि उन्हें वहां थोड़ा सा भय महसूस हो रहा था कि कहीं ऐसा ना हो, इस निर्जन स्थान पर उसकी आवाज सुनकर कोई जंगली जानवर न आ जाय । 

वे चाहते तो अपने विषय में अपनी पत्नी को यहाँ की सारी व्यथा कथा कह सुनाते,किन्तु वे इतनी बड़ी गलती नहीं कर सकते थे । वे जानते थे कि यदि उसे बता देंगे तो वह डर के मारे वहीं फूट फूट कर रोने लगेगी,घर में तूफ़ान आ जायेगा, हमारे सिवा उसे संभालने वाला भी तो वहाँ कोई नहीं है । वे अपनी कातर दृष्टि से चारों तरफ निहारते हुए. बस इतना ही बड़े आहिस्ते से बोले थे । 


नहीं नहीं यहां ऐसी कोई भी बात नहीं है, मैं अपनी बहन के घर बड़े आराम से पहुंच चुका हूँ, अभी फोन रख बाद में बात करेंगे, 
किन्तु उनकी धर्मपत्नी रेणुका इतनी जल्दी कहाँ मानने वाली थी, वह इस बार अपनी तीखी आवाज में मिश्री घोलते हुए बड़े मृदुल स्वरों में बोली थी
हेलो,अजी सुनते हो एक बार अपनी बहन जी से तो बात कर दो न यानी कि हमारी अपनी प्यारी जीजी जी से । 


नहीं नहीं, अभी बिल्कुल भी बातें नहीं हो सकती, क्योंकि मेरी बहन इस समय किसी काम से पड़ोस में गई हुई है, आएगी तो अवश्य बात करा दूंगा दूंगा, लेकिन अभी फोन रख । 
इतना सुनते ही रेणुका तुरंत बोली थी, 
हेलो,अजी अभी इतनी जल्दी ही क्या पड़ी है कि मेरा फोन रखवा रहे हो, जरा मेरी बात तो ध्यान से सुन लीजिए, वो क्या है की जीजी के बच्चों के लिए कुछ खाने पीने की सामग्री साथ में ले गए हो कि नहीं । 

 हां हां ले आया हूं, फिर भी तुम अभी फोन रख बाद में बात करेंगे । राम मनोहर पंढरपुरी रास्ता चलते हुए बोले थे । क्योंकि वे अपनी पत्नी से इतना सफेद झूठ इसलिए बोले थे, क्योंकि उन्हें आभास था कि यदि मैं अपनी धर्मपत्नी से ऐसे ही बातें करता रहूंगा,तो मुझे यात्रा करने में असुविधा भी होगी और साथ ही साथ जंगली जानवरों का भय भी मेरे लिए बढ़ता जाएगा,तथा ठीक समय पर अपने दोस्त राम भैया के घर भी नहीं पहुंच पाउंगा, अतः वह ऐसा सोचकर फोन कट करते हुए अपनी मोबाइल को भी स्विच ऑफ कर लिया ।

राम मनोहर पंढरपुरी, मन ही मन बडबडाते हुए आगे की ओर बढ़ते चले गए, उनको इस बात का पहले से ही अनुभव था कि ये स्त्रियां भी बड़ी अजीब जाति की होती है, चाहे वो हमारी हुई या किसी गैर की,अपने आगे किसी की कुछ सुनती ही नहीं हैं और न ही कुछ समझती हैं, जब चाहा बहस कर लेती है और जब चाहा फोन लगा देती हैं । 

इन्हें इतना भी नहीं मालूम की अपना आदमी जहां पर जा रहा है,वह वहां पहुंचा है या नहीं, यदि पहुंचा है तो बिचारा वह किस हाल में है किस परिस्थिति में है,इतना उन्हें सोचने का ज्ञान नहीं । बार-बार मना करने के बाद भी वह फोन रख ही नहीं रही थी, इसीलिए तो हमने फोन काट दिया । 

अरे फोन ही नहीं काटा, अपनी मोबाइल को स्विच ऑफ भी कर दिया,अब देखते हैं कि वह फोन कैसे लगाती है । ये सारी स्त्रियां तो एक ही जात समूह की है, बिरादरी चाहे जो भी हो । 
ये बहुत ही बातूनी मिजाज की नटखटी चटपटी और होशियार होती हैं,यदि इनसे भविष्य में कोई गलती भी होती है तो इनकी सजा हमारे मानव समाज में न के बराबर होती है, जैसे कि छूमंतर,जैसे कि सागर की गहराई में सागर के आधार का ही न पता चले । 

वह कैसे, वह ऐसे कि जैसे इनके युगल नैनों से जब दो बूंद आंसू छलकते हैं तब उसमे हम साधारण मनुष्य ही नहीं,बल्कि ब्रह्मांड के सारे देवतागण भी उसमें पलक झपकते ही डूबने उतिराने लगते है । तब वहां न क्षमा रह जाती है, न हीं उसकी की हुई कोई गलतियां । क्योंकि ये सब पलक झपकते ही गंगू तेली के तेल की कनस्तर में घुल मिल कर,घर घर पहुंच जाते हैं ।
 
ये जब चाहें किसी को भी बिना कसूर के, बिना कोई गलती के उसी के दोनो कानों को उसी से पकड़वाकर, उसे मुर्गा बनवा सकती है । ये जब भी चाहें तो अपने दोनों पैरों के पंजों पर उसके नाक रगड़वा लें,ये जब भी चाहे तो घर के मुखिया की नाक भी,ऊंची से ऊंची करवा दें, किंतु यदि ये चाहे तो उस नाक को एक ही पल में एक ही झटके के साथ,कटवा कर अलग कर दें ।

वे मन ही मन स्वयं से ही बड़बड़ाये जा रहे थे । 
अरे ये सब बातें छोड़ो अब आगे की सुनो । 

जब लक्ष्मण जी ने रावण की बहन सुर्पनेखा का नाक कान काटा था तब रावण स्वयं में घबराकर अपनी ही नाक ढूंढने लगा था । जब उसे पता चला कि हमारी नाक तो बची है किंतु हमारी बहन सुर्पनेखा की नाक कट चुकी है,तब वह भयभीत हो गया कि हमारी भी नाक कट सकती है । इसलिए वह अपनी नाक बचाने के लिए और अपनी नाक को और भी सीधा करने के लिए राम और लक्ष्मण से युद्ध कर बैठा । 

जिसका परिणाम,उसका समूल नाश हो गया । 
ये तो रहा त्रेता युग में रामायण काल की बात । 

आगे द्वापर युग में भी ऐसा हुआ था । महाभारत काल में द्रोपदी की वजह से दुर्योधन को ऐसे लगा था जैसे की उसकी नाक,पहले से कुछ टेढ़ी हो गई है, फिर क्या हुआ कि वह अपनी नाक सीधी करने के लिए पांडवों से ऐसा युद्ध किया, ऐसा युद्ध किया की उसका सारा समूल ही नाश हो गया । 

अतः ये स्त्रियां युगो युगो से विषकन्या के समान,ममता की सागर गुणों की रसखान एवं रूपों की परिधान हैं, इनसे बहस करना, इनके पैनी दृष्टि का शिकार होना, इन पर अनायास ही आसक्त होना, तो समझ लीजिए कि हम किसी स्वर्ग और नरक की यात्रा करने की तैयारी कर रहे हैं।
 
वे जैसे-जैसे आगे की ओर बढ़ते जा रहे थे वैसे-वैसे वे अपने आप में स्वयं से बातें भी करते जा रहे थे । 
जैसे की बहुत लोगों की स्वयं से बात करने की एक आदत होती है, वे मन ही मन सोचे जा रहे थे कि यदि मेरी धर्मपत्नी रेणुका फोन न लगाई होती तो भला अब तक मैं अपने दोस्त राम के घर न पहुंच जाता । 

वैसे मेरा बेटा ही हरामखोर था जो पुलिस की नौकरी पाने के बाद भी मुझे गिफ्ट में ये कीपैड मोबाइल दे दिया है, क्या वह एंड्राइड मोबाइल नहीं दे सकता था,जिससे समाज में मेरी इज्जत और भी बढ़ जाती, किंतु वह ऐसा नहीं किया । 
पता नहीं कितने लोग मेरी इस छोटी सी मोबाइल को देखकर अपनी खीसें निपोरे होंगे,अपने मुंह को छिपा छिपा कर हसें होंगे, राम जाने मेरी उस समय उनके बीच में, कितनी फजीहत हुई होगी । 

वे मन ही मन बडबडाते बडबडाते आगे की ओर धीरे-धीरे बढ़ते चले गए थे । अभी दस कदम भी वे आगे नहीं बढे होंगे कि अचानक ही उन्हें बीहड़ बन सघन झाड़ियों में,सियारों के झुंडों की भारी आवाजे एक साथ एक ही सुर में सुनाई पड़ी,जिसे सुनकर उनकी धड़कनें तेज हो गई, उनके हाथ पांव में जैसे लकवा मार गया हो, वे वहीं गिरते गिरते बचे ।

वैसे भी पूस की ये काली रात अपने आगोश में जो चतुर्दिक सन्नाटा लिये हुए,भाँय भाँय, सांय सांय कर रही थी, ऐसी स्थिति में किसी की भी आवाज, उसके आवाज से हजार हजार गुना तेज स्वरों में दूर दूर तक गूंजती रही होगी । 

वे घबराते हुए डर के मारे उसी स्थान पर अपनी दोनों आंखें बंद करके, किसी डरे हुए खरगोश की भांति, शून्य अवस्था में चुपचाप सिकुड़ कर वहीं बैठ गए थे । क्षणमात्र में ही उनके मन की भयभीत कल्पनाओं ने अपना भयानक परिवेश बदलते हुए,उन्हीं के प्रति भयावह उड़ाने भरने लगी थी,जो उस वीभत्स असित तिमिर में भयाक्रांत चित्र उकेरती हुई उनके चारों तरफ ठहर सी गई । 

उनकी धड़कने उनकी पसलियों पर अव धाड धाड से बजने लगे थे । जैसे कि उन्हें कोई सांप सूंघ गया हो,।वे वहीं बैठे-बैठे बड़ी तेजी के साथ लंबी-लंबी साँसे लेते हुए कुछ सोचने बिचारने लगे थे । यदि यहां पर जंगली सियारों का झुंड है और ये सियारों की ही आवाजें हैं तो निश्चित ही यहां पर भेड़िए भी होंगे,शेर बाघ और चीते भी हो सकते हैं, इतना सोचते ही राम मनोहर पंढरपुरी पसीने से तर–बतर होते चले गए । 

जहां कुछ समय पहले उनका सारा शरीर ठंड के मारे ओला हो चुका था । कभी-कभी भय इंसान का सबसे बड़ा दुश्मन भी हो जाता है । अब यही देख लीजिये कि भय के प्रभाव से ही,उस विकराल शीतलहरी में राम मनोहर पंढरपुरी को पसीने आ रहे थे । 

इसका कारण वे क्षण मात्र में ही समझ चुके थे कि शायद यह मेरे डरे हुए विचारों की परिकल्पनाएं ही हैं जो मुझे भयभीत कर रही है । ऐसा सोचते ही वे धीरे-धीरे सामान्य होते चले गए,उनका भय भी अब अवसान लेने लगा था ।

अब वे अपने स्थान से धीरे-धीरे किंतु बड़े ही शांत चित्त से उठते हुए, इत उत चारों तरफ अपनी दृष्टि को घुमा घुमा कर, एवं अपनी नजरे फाड़ फाड़ कर सर्वत्र देखते निहारते हुए आगे की ओर बढ़ते चले गए । 

जैसे ही वे अपनी भयभीत कल्पनाओं का वहम समझे, वैसे ही उन्हें ठंड का आभास होना शुरू हो गया, वे वही पर थर-थर ऐसे कांपने लगे थे जैसे कि मंद मंद गति से चलती हुई हवाओं के संग ,पीपल के पत्ते कांपते हों, उनका सारा शरीर उनके बस में नहीं रहा, उनकी सारी बत्तीसियां भी ऐसे कटकटाने लगी थी जैसे कि किसी सूखी लकड़ी पर कोई षटकोण अपना चोंच मार रहा हो।

देखते ही देखते उनके दोनों हाथों की उंगलियां भी ऐसे हो गई थी जैसे की अभी क्षण मात्र में ही ठंड के कारण हथेलियों से कट कट कर अलग हो जाएगी दांत अनवरत किट किटा रहे थे । 
पैरों में पहने हुए उनके जूते और मोजे भी अब किसी काम के नहीं रहे, क्योंकि उस कुहाँसे भरे हिमपात में भीग भीग कर बर्फ बन चुके थे । जूते और मौजों में कैद उनके युगल पैरों की सुकोमल उंगलियां भी अब रक्त रंजित होकर सुन्न हो चुकी थी ।
दांत अनवरत किटकिटा रहे थे, नाक नथुने और जबड़े भी अब पूरी तरह से काले स्याह हो चुके थे । 

क्षण भर में ही राम मनोहर पंढरपुरी को ऐसे लगा जैसे की अब उनका आखिरी समय आ चुका है । ऐसी भयानक विकराल ठंड में उन बर्फीली हवाओं के भी होश उड़ चुके थे, जब राम मनोहर पंढरपुरी का सारा शरीर पसीने से तर हो चुका था ।

जब वह महा भयानक आक्रांतक मौसम, अपनी पूरी शक्ति लगाकर आक्रामक आक्रमण करते करते थक हार गया, तब वह अपने गर्विले मस्तक को नत करके खामोस हो गया । 
जंगली जनवारों के भय के कारण उस राम मनोहर पंढरपुरी के दुबले पतले शरीर ने, यूं पल भर में ढेर सारे पसीने उगल कर उस मौसम को वहीं पर ढेर कर दिया ।

वह राम मनोहर पंढरपुरी क्षण मात्र में ही पसीने पसीने होता चला गया था,किन्तु जिस क्षण वह इसे अपने मन का वहम मान लिया, उसी क्षण वह शांत चित्त होकर आगे की ओर बढ़ता चला गया, अब वह सामान्य हो चुका था । 
किंतु ये क्या, तत्पक्षत ही उसे बर्फीली हवाओं ने अपने आगोश में लेते हुए क्षण मात्र में ही उसे ओलावृष्टि का एहसास करा दिया, जिससे उसके शरीर में अब पुनःसिहरन जैसी कपकपी शुरू हो गई ।
वह हू हू करते हुऎ कांपने लगा था ।

तो दोस्तों, क्या आप जानना चाहते हैं कि वह व्यक्ति कौन था, जिसने राम मनोहर पंढरपुरी को गले लगा लिया था ?

दोस्तों, अगले भाग को पढ़ने के लिए “अगले” पर क्लिक करें और पिछले भाग के लिए “पिछले” पर क्लिक करें।

इस “दोस्ती” हिंदी कहानी को अपने दोस्तों के साथ साझा करें और कमेंट में बताइए कि आपको यह कहानी कैसी लगी।

यह कहानी पूर्णतः काल्पनिक है, इसका उद्देश्य केवल साहित्यिक मनोरंजन और मानवीय भावनाओं को प्रस्तुत करना है।
लेखक: श्री केदार नाथ भारतीय
ब्लॉगर | कहानीकार  


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