राघव की रूह कांप गई। हे...! बस कहां गई, ऐसे कैसे हो सकता हैं, मेरे उतरते ही बस गायब हो गई ! हे भगवान ! वह डर गया था। उसे कुछ समझ नहीं आ रहा था। यह एक रहस्य और मनोवैज्ञानिक तत्वों से भरपूर हिंदी उपन्यास की शुरुआत है।
यह कहानी एक आम इंसान की है... लेकिन एक ऐसी त्रासदी से गुज़रने की है, जिसे सुनकर आपकी रूह कांप उठेगी। यह कहानी पूरी तरह काल्पनिक है, लेकिन इसके हर शब्द में एक सच्चाई की झलक छुपी है।
"विचित्र दुनिया" सिर्फ एक कहानी नहीं है ! ये एक अनुभव है, जो आपको अंदर तक हिला कर रख देगा...
लेखक: केदार नाथ भारतीय | प्रयागराज, उत्तर प्रदेश
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| एक खबर… और ज़िंदगी की सारी नींव हिल गई |
विचित्र दुनिया ..(हिंदी उपन्यास)—
वह मुंबई के किसी फाइव स्टार होटल में मैनेजर के पद पर था । उसका नाम रघु राय था , लेकिन लोग बड़े प्यार से उन्हें राघव राघव ही कहा करते थे । एक दिन राघव अपने केबिन में बैठे हुए बड़े इत्मीनान से अखबार पढ़ रहे थे , कि अचानक वह चौंक पड़े अरे यह क्या ! मेरे पूरे गांव में भूकंप की त्रासदी ।
प्रकृति का महा भयानक तांडव ! अखबार का मेन पृष्ठ पढ़ते ही उन्हें बिजली का शाक सा लगा ।
उनके हृदय की धड़कनें अति तीव्र हो गई । बड़ी कठिनाई से उनके होंठ फड़फड़ाये थे! न नहीं नहीं! ऐसा नहीं हो सकता ! मेरे गांव अकोढापुर में इतनी भयानक त्रासदी नहीं आ सकती।
भगवान इतना बड़ा निर्दयी नहीं हो सकता , जल्दीजल्दी इस घटना से संबंधित सारा समाचार पढ़ने लगा । जैसेजैसे वह पढ़ता जाता वैसेवैसे उसके चेहरे का रंग बदलता जाता । उसका रसीला गला क्षण मात्र में ही सुख कर ठुंठ सा हो गया ।
उसके पसलियों पर उसके हृदय की धड़कनें धाड़ धाड़ से बजने लगी । वह अखबार से अति शीघ्र ही सारा घटनाक्रम पढ़ लिया ।
अब वह जोरजोर से रोने लगा था । उसके आंखों से आंसू सावन भादो की भांति उसके गालों पर रिमझिम बनकर टपकने लगे थे । वह भावुकता बस करुण क्रंदन कर रुँधे हुए गले से बोला था । हे भगवान ऐसे कैसे हो सकता है , कि मलबे के ढेर में दब कर मेरा सारा गांव मर गया । अब वहां कोई भी नहीं बचा।
राघव का अकेला सफर कहां तक ले जाएगा– विचित्र दुनिया भाग 1
घोर निनाद करती हुई मौत की स्वर लहरियों के सिवा। किल्लर लातूर और भुजबल राजकोट जैसा सन्नाटा । सांय सांय भाय भाय करती हुई शमशान घाट जैसी बिरानी ! अब वहां एक भी जीवन नहीं बचा । मेरे मां बाप, मेरी धर्मपत्नी और और वह मेरा इकलौता पुत्र मेरा सुजीत मेरा प्राण अब वह भी इस संसार से सबके साथ विदा हो गया ।
अब मैं कहां जाऊं ! कहां मरू ! कहां जरू !म मेरा सब कुछ बर्बाद हो गया! मेरा सब कुछ बर्बाद हो गया। अचानक वह जोर से चिल्लाया न नही,नहीं!। ऐसा नहीं हो सकता! नहीं हो सकता ऐसा! म मैंने किसी का कुछ नहीं बिगाड़ा ,कभी नहीं बिगाड़ा तो मेरा क्यों बिगड़ेगा। वह रो रहा था! वह भगवान से मन ही मन गिड़गिड़ा रहा था।
इसी बीच वह अनगिनत बार अपनी मोबाइल से अपने घर फोन लगाने की कोशिश किया। किंतु उसकी उंगलियां उसके मोबाइल नंबर पर टच ही नहीं हो रहा था। पता नहीं उसे आज क्या हो गया था कि उसकी मोबाइल भी उसके हाथ से छूट छूट जा रही थी। सहसा वह चिल्लाया! ना नहीं नहीं नहीं! यह घटना मेरे गांव की नहीं हो सकती।
हो सकता है ,अकोढापुर गांव कोई दूसरा गांव हों। एक ही नाम से इस देश में कई कई हजार गांव हो सकते हैं। वह थोड़ा संयम हुआ! किंतु ये क्या? वह अखबार उठाकर पुन: पढ़ने लगा। जिला बदरपुर! गांव कसौदा, पोस्ट हीरैठी तथा ब्लॉक ठुमरा तहसील भिवानी। भूकंप की अति भयावह त्रासदी! येन केन प्रकारेण, सारा गांव ही अति विनाशक भूकंप की चपेट में कॉल कवलित हो उठा।
अब वहां जीव जंतु और पशु पक्षी भी नहीं बचे। अब वह चिल्लाया अति गति से चिल्लाया, किसी घायल पक्षी की तरह फड़फड़ाया! और फिर वह जोरजोर से फफक फफक कर रोने लगा। क्योंकि अखबार के सारे पते उसके गांव के प्रामाणिक पते थे। अब वह कटू सत्य से पूर्णत: परिचित था।
अति विशद विषाद से उसकी आत्मा झकझोर.उठी थी। उसके शरीर में ढेर सारे पसीने उभर आये। दीर्घ कालिक भयाक्रांत सनसनी उसके संपूर्ण मस्स्तिष्क पर नृत्य सी करने लगी। पीपल के पत्तों की भाति उसका सारा शरीर कापने सा लगा। वह पसीने पसीने हो उठा।
अकस्मात् वह अपनी कुर्सी से नीचे की ओर धड़ाम से गिर पड़ा। अब वह संज्ञा शून्य था। उसकी दोनों आंखें फटी हुई मुद्रा में छत की ओर निहार रही थी।
काश! आज अखबार में ऐसा समाचार ना छपा होता, तो वह प्रसन्न चित होकर सारा अखबार बड़े इत्मीनान से पढ़ता। दफ्तर आते समय वह कितना खुश था, कितना आहलादित था। अचानक कुछ ही क्षणों में उसकी तंद्रा भंग सी हो गई! अब वह करहते हुए धीरे से उठा! उसका सर चकरा रहा था ।
धीरे,धीरे वह बाथरूम की तरफ पहुंच। नल की टोटी खोलकर वह अपने चेहरे पर पानी की छीटे मारे। छपाक छपाक छपाक ततपश्चात वह सर को पूरी तरह से भिगोया। अब वह धीरे,धीरे दर्पण के सामने पहुंचा। तौलिये से पूरी तरह पानी को सुखवाया। फिर धीरे,धीरे वह उसी स्थान पर आकर बैठा जाता है।
जहां पहले बैठा था। उसके होठों से अब भी भूकंप त्रासदी की घटना फूट रही थी। अब मुझे गांव जाना है, अब मुझे गांव जाना है इसी वक्त गांव जाना है!
दहिया स्टेशन से अकोढ़ा तक — एक हारे हुए मन का सफर
विचित्र दुनिया (हिंदी उपन्यास)भाग–2 पढ़ने के लिए यहाँ क्लिक करें
क्या राघव अपने गांव तक सुरक्षित पहुंच पाएगा?
या रास्ते में उसका सामना किसी अनजानी शक्ति से होने वाला है?
यह जानने के लिए जुड़े रहिए kedar kahani (www kedarkahani in) के साथ।
यह कहानी पूर्णतः काल्पनिक है, इसका उद्देश्य केवल साहित्यिक मनोरंजन और मानवीय भावनाओं को प्रस्तुत करना है।
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