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आज की विशेष कहानी

iPhone 18 pro Max:लॉन्च से पहले बड़ी जानकारी

iPhone 18 pro Max पहले से ज्यादा पावरफुल और स्मार्ट हो सकता है! Apple अपने आप में एक अलग ही अंदाज है, किसी हीरो से कम नहीं । Apple ने 2007 में iphone 2G लॉन्च किया था, जो टचस्क्रीन, मल्टी-टच जैसी तकनीक का इस्तेमाल किया गया था। पब्लिक इसे बहुत अच्छी तरह से पसंद किया था । और आज देखा जाए तो यह धीरे-धीरे अपने आप में एक हीरो ही हैं। जो समय के अनुसार एक अलग तरह की बदलाव लाता रहता है, जिसे लोग खूब पसंद करते हैं। हम बात कर रहे हैं iphone 18 pro max की जो इस समय सोशल मीडिया और इंटरनेट जैसे हर जगह इसी की चर्चा सामने नजर आ रही है। क्या यह iphone 17 pro max से बेहतर होगा ? एक बार नजर घुमा के देखा जाए तो iphone 17 pro max पहले से ही अपने आप में दमदार  साबित होती है क्योंकि इसमें 48mp ट्रिपल कैमरा ,A19 pro चिप शानदार AI फीचर , मजबूत ceramic sheild और प्रीमियम डिजाइन, टिकाऊ बॉडी  और बेहतर सुरक्षा से लैस था। iPhone 18 Pro Max इससे भी अधिक पावरफुल होने की उम्मीद है। आइए जानते हैं, कैसे... डिजाइन और डिस्प्ले हम बात कर रहे हैं डिजाइन की Apple ने iPhone 18 pro Max की डिजाइन बेहतर और संतुलित ...

विचित्र दुनिया – भाग 7 |धूम्रा का रहस्य अभी बाकी है (हिंदी उपन्यास)



राघव एक फाइव-स्टार होटल की सुकूनभरी कुर्सी पर बैठा, हाथों में अख़बार थामे पन्ने पलट रहा था कि तभी उसे एक पंक्ति ने उसके भीतर सब कुछ हिला दिया—
“अकोढापुर गांव भूकंप से पूरी तरह नष्ट…"

लेकिन उसे क्या पता था कि यह यात्रा उसे उसके गांव तक नहीं, बल्कि नियति के किसी और ही भयावह मोड़ तक ले जाने वाली है।

रास्ते में ऐसा कुछ घटा, जिसे न तर्क समझ सका, न समय। राघव कभी अकोढापुर पहुँच ही नहीं पाया। इसके बजाय वह पहुँच गया एक अनजानी, रहस्यमयी और भयावह दुनिया में—एक ऐसी विचित्र दुनिया, जहाँ आत्माएँ भटकती थीं, प्रेत छायाओं की तरह मंडराते थे और शैतानी शक्तियाँ शासन करती थीं। 
यह कहानी पूरी तरह काल्पनिक है,आप जिस कहानी को पढ़ रहे हैं, उसके लेखक हैं — केदारनाथ भारतीय उर्फ भुवाल भारतीय, प्रयागराज (उत्तर प्रदेश) से।
चलिए, अब आगे बढ़ते हैं....




विचित्र दुनिया (हिंदी उपन्यास)—पांड्या पर्वत पर मोक्ष की घड़ी

फाइव-स्टार होटल में कुर्सी पर बैठा राघव अख़बार पढ़ता हुआ, पीछे हरियाली और बर्फ़ से ढके पहाड़ों पर स्थित एक महल की झलक, एक काल्पनिक कथा का दृश्य
कुछ ख़बरें सिर्फ़ पढ़ी नहीं जातीं, वे जीवन की दिशा बदल देती हैं।

"ध्रुमा राक्षस" पांड्या पहाड़ के ऊपर, शिव मन्दिर के निकट, एकांतवास लिए समाधिस्त है । रात्रि के अब नौ बजने वाले है । आज की रात्रि अमावस की प्रथम प्रहर की काली रात्रि है । आज ही उसे अपने इस राक्षस योनि से सदा सदा के लिए मुक्ति मिल जाने वाली है। उसके चारों तरफ दिव्य प्रकाश की चंचल किरणे, अपनी तेजोमय आभा लिए पूर्ण आह्लादित हैं ।

तभी उसके करीब उसके मुखमंडल के संमुख, एक सफेद परिधान पहने, अलौकिक दिव्यता से परिपूर्ण, सत्पुरुष का आगमन होता है वह मंद मंद मुस्कान बिखेरे हुए धूम्रा राक्षस को संबोधित करता है...।

हे धूम्रे, हम विधाता के भेजे हुए देवदूत हैं। हम आपसे कुछ अवशयक बातें करना चाह रहे हैं, आप अपनी आँखें खोलिए । 
देवदूत के तीसरे संबोधन में धूम्रा राक्षस ने, अपनी दोनों आंखें खोलकर आश्चर्यजनक दृष्टि से, देवदूत को निहारने लगा। देवदूत ने अति विशिष्ट भाव में मुस्कुराते हुए कहा..।

हे भद्र, अब आप बैकुंठ लोक के अधिकारी बन चुके हो, अब आपकी यह राक्षस योनि, जिसमें तुम हजार हजार कल्पों से निवास कर रहे हो। इससे अब तुम्हे मुक्ति मिलने वाली है। ईश्वरी आदेसानुसार आज रात्रि, 12:00 बजे तक का समय, आपके कायाकल्प के लिए सुनिश्चित किया गया है। 

अतः आप इसके मध्य जो भी कार्य करना चाहेंगे, उसे आप अविलाम्ब ही सफलतापूर्वक पूर्ण कर सकते हैं, आपके मन के अनरूप आपके सोचे हुए सारे कार्य मिस्कंटक रूप से संपन्न होंगे....। इसके पश्चात यदि आपके मन में कोई जिज्ञासा हो तो उसे निःसंकोच पूछ सकते हैं।

देवदूत का एक-एक शब्द पारदर्शी एवं सत्य पूर्ण था जिसे सुनकर धूम्रा राक्षस ने आभार व्यक्त करते हुए बड़ी विनम्रता के साथ बोला...। 
हे देव, आपने हमारे उपर बड़ा ही छोभ किया है, हम इतने अल्प समय में जो भी निर्णय लें, वह पूर्ण सत्य हो..., तथास्तु...।

इतना कहते हुए देवदूत ने अपने होठों पर अति मधुर मुस्कान बिखेरते हुए अंतर्ध्यात हो गये । अब धुम्रा राक्षस को पूर्ण यकीन हो गया, कि उसके जाने का समय आ चुका है वह तेजी के साथ सोचने लगा था कि इतने अल्प समय में वह क्या-क्या करें । 


सच का दर्शन, विनाश का संकेत

धूम्रा राक्षस अपने योग–मंत्र से अपने साथियों का पता लगाता हुआ
वह तत्क्षण बिना एक पल का समय गवाये हुए। अपने योग मंत्र से टोनी पहाड़ पर गये हुए साथियो के विषय में जानकारी जुटाने लगा। अचानक वह चौंका।

हें, यह क्या...। मंडल सहित हमने कुछ साथी गणों को उस टोनी पहाड़ पर जो भेजे थे, वे सब के सब, ब्रह्मराक्षस के प्रभाव से भेड़ बकरी और बैल बन चुके है। अफसोस, अफसोस की, वह धूर्त इन सभी की बलि भी देना चाह रहा है। 

मेरे साथी रूहों को शरीर प्रदान करके उन्हें घोर यातना देकर मार देना चाहता है। और तो और उन दोनों मासूम बच्चों को भी आज ही की रात्रि, कुछ समय बाद उनका भी काम तमाम कर देना चाहता है।

 न–नहीं, नहीं नहीं....। मैं ऐसा हरगिज भी नहीं होने दूंगा, याद आया मंत्र योग के बल से जो मैं पहले देखा था, आज वही मुझे मेरे सामने प्रत्यक्ष रूप में दिखाई पड़ने लगा है।  

किंतु मैं ऐसा हरगिज़ नहीं होने दूंगा मैं आ रहा हूं वहीं आ रहा हु । जहां तुम जैसे बनावटी जादूगर सत्य और धर्म को सदा सदा से ही लज्जित करते आ रहे हो, मैं वहीं आ रहा हूं।
मूर्ख मेरे उन धर्म राक्षसो, को अपने जादू के प्रभाव से बंदी बनाकर उनका अपमान क्यों कर रहा है। अब तेरे पाप का घड़ा भर चुका है। तुम दंड के पूर्ण अधिकारी बन चुके हो ।

अतः अब तेरे कारण मुझे शपथ लेना ही पड़ गया कि तेरी भी मुक्ति मेरे साथ हो जाए तो कुछ भी बुरा नहीं होगा मैं बैकुंठ लोक जाने से पहले ही, जिस पाप के आयुध् से तुम उन्हें काट रहे हो उन्हें मार रहे हो उन्हें घायल कर रहे हो, तेरे उसी आयुध् से तेरा विनास् न कर दिया, या तुझे दंड न दे दिया तो मेरा भी नाम धूम्रा राक्षस नहीं, अचानक वह धूम्रा राछासं अपनी बंधी हुई शिखा को एक झटके के साथ खोल दिया, और फिर अचानक उसके मुख से भयानक गुर्राहट निकलने लगी।

हा हा हा हा हा अरे दुष्ट ब्रह्मराक्षस ...। अब तुम्हें बचाने के लिए तेरा कोई भी तंत्र-मंत्र काम नहीं आएगा । "हा हा हा हा हा हा", उसकी लाल-लाल सुर्ख आंखें जैसे रक्तों से भरी हुई, अब बाहर की तरफ निकलने वाली हों। वह अपने आसन से अचानक उठते हुए अपने सर को एक तीव्र झटका दिया, और फिर जोर-जोर से अट्टहास करने लगा ।


ओम की गूंज और धूम्रा का अंतर्धान

मगर ये क्या..? धूम्रा राक्षस के चारों तरफ अचानक ही धुओं का गुब्बार उठने लगा, शुरू शुरू में सफेद धुआं का और फिर बाद में काले काले धुओं का तांडव उसके चारों तरफ भयावह दिखाई पड़ने लगा ।

किंतु यह क्या...? समझ से परे है , वह धूम्रा राक्षस, धुओं के मध्य एक गोलाकार परिधि बनाकर उसी में विलीन होते हुए धुओं के साथ आकाश के दक्षिण दिशा में उड़ता हुआ गायब हो गया।

पता नहीं क्यों उसके जाने के पश्चात भी उस पांड्या पहाड़ पर देवदूतों के होने की पुष्टि हो रही थी। वहां ऐसा लग रहा था, जैसे की नभ बृंदारकों की कुछ टोलियाँ, आपस में संसद जुटाये किसी विशेष विषय पर विशेष संवाद एक दुसरे से छेड़ने पर तुले हुए हों, उस सुरम्य वातावरण में ओम नमः शिवाय का स्वर भेदित् हो रहा था।

वहां मानव श्वेतांबर धारण किए कुछ आकृतियां दूर-दूर तक दिखाई पड़ रही थी वहां विशिष्ट सुगंध चारों तरफ मन को आकर्षित करते हुए हृदय को भाव विभोर कर रही थी । देवदार, नारियल और बबूल के कुछ ऊचे ऊचे पेड़ बड़े ही मनोहारी लग रहे थे की तभी वहाँ हंसों के कुछ जोड़े अपने परों को फड़फड़ाते हुए अनायास ही उस पहाड़ की चोटी पर आकर बैठ गये, वे देखने में अति सुंदर लग लग रहे थे। उस दुर्गम स्थान पर कोयल जैसी पंछी तथा नीलकंठ भी मौजूद थे।


जो अपने मधुर – कंठों से उस वातावरण में झंकार भर रहे थे वही एक डाल पर बैठा हुआ एक रात्रिचर प्राणी उल्लू, बड़े ही ध्यान भाव से उनके रस गानों को सुन सुन कर अपने पंख फड़फड़ा रहा था, दूर से देखने पर वह पहाड़ सफेद संगमरमर की भाँति बड़ा ही मनोहारी लग रहा था

जहां पांड्या पहाड़ था उसके चारों तरफ बर्फीली हिमपात की चादरें बिछी हुई प्रतीत हो रही थी! रात्रि होने के पश्चात भी वहां दिन का प्रकाश जैसा एक गोलाकार दूधिया स्तंभ दिखाई पड़ रहा था, जहां पांड्या पहाड़ होने का एक दुर्लभ श्रेष्ठ गौरव कहा जाता था।


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यह कहानी पूर्णतः काल्पनिक है, इसका उद्देश्य केवल साहित्यिक मनोरंजन औरमानवीय भावनाओं को प्रस्तुत करना है।

लेखक: केदार नाथ भारतीय, नागेन्द्र बहादुर भारतीय 
ब्लॉगर | कहानीकार  
Website: https://www.kedarkahani.in


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