क्या वह राजमहल सच था या टूटी हुई जिंदगी का एक सपना? उसने बताया कि एक सप्ताह पहले यहां मेरी तीन बकरियां गुम हो गई थी, एक मिली और दो अभी नहीं मिल सकी है उन्हीं को ढूंढते–ढूंढते मैं यहां पहुंचा था, दूर से जब मैंने आपको देखा तो मुझे लगा कि शायद आप ही बकरियां चोर हैं आपके पास आया तो आप गहरी नींद में सो रहे थे, मैंने आपको उठाने का प्रयास किया तो आप उठे, किंतु आपने रामचंद्रन पंढरपुरी के विषय में जो कुछ भी हमें बताएं उसे सुनकर हमें भी गहरा सदमा पहुंचा है, हम भी भयभीत हो उठे हैं । यह कहानी केवल शब्दों का क्रम नहीं, बल्कि उन रिश्तों की गूंज है...आइए, इस दुर्गम पथ पर राम मनोहर के साथ चलें और दोस्ती के उस अर्थ को समझें जो हर मोड़ पर खुद को साबित करता है। लेखक: केदार नाथ भारतीय उर्फ भुवाल भारतीय, उत्तर प्रदेश, प्रयागराज
यह कहानी पूरी तरह काल्पनिक है,आप जिस कहानी को पढ़ रहे हैं, उसके लेखक हैं — केदारनाथ भारतीय उर्फ भुवाल भारतीय, प्रयागराज (उत्तर प्रदेश) से।
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| जहाँ मानव नहीं, बल्कि शक्तियाँ निर्णय लेती हैं। |
अधर्म के विरुद्ध राक्षस का न्याय
दो महीने बाद ......., वह अति विशाल, विराट, गगन चुंबी के समान स्वच्छ विस्तार लिये, एक दुर्गम एवं भाव पूर्ण रस में डूबा हुआ,विशिष्ट मनोहारी पहाड़ था । इतिहास के पन्नों में वह पांड्या पहाड़ के नाम से सुविख्यात था । देखने में वह अलौकिक था , हजार हजार किलोमीटर दूर-दूर तक, वहां एक भी पहाड़ नही था, वह स्वयं में इकलौता और स्वाभिमानी पहाड़ था ।
उसके तराई भू–भाग में चारों तरफ से वन क्षेत्र का सघन विस्तार था, पहाड़ के निचली सतह में कुछ ऐसी ऐसी भयानक सुरंगे थी। जिसे एक बड़ा सा गांव कह लेना अतिशयोक्ति नहीं होगा। पहाड़ के अंतिम उच्च शिखर पर ,भगवान शिव की एक पुरानी किंतु दुर्लभ मंदिर थी।
जिसकी पूजा अर्चना धूम्रा राक्षस अपने साथियों संग किया करता था,वह बड़ा ही धार्मिक विचार का था। उसी सुरंग में वह सत्य धर्म का पुजारी न्याय प्रिय एवं कुशल शासक के रूप में रहता था। जिसकी राक्षस लोक में एक सार्वभौमिक ,अटूट धर्म सत्ता का साम्राज फैला था।
धूम्रा राक्षस के बनाये हुए कुछ ऐसे ऐसे सिद्धांत थे। जिसे मील का पत्थर कह लेना अनुचित नहीं होगा। उसके सिद्धांत के अनुरूप यदि कोई भी राक्षस जाति,किसी भी मानव प्राणी के ऊपर, अत्याचार अनाचार और दुराचार करता था, अनायास ही उसे मानसिक क्षति पहुँचाता था, अधर्म और अन्याय करता था, तो यह धूम्रा राक्षस, उससे युद्ध करके, उसे परास्त करता था और उसको उचित दंड देता था।
इसके लिए चाहे जो भी परिणाम उसके सामने आ जाये। यहां पर धूम्रा राक्षस को मानव जाति के लिए, एक फरिश्ता कह लेना, निश्चित ही सर्वश्रेष्ठ बात होगी। वह हजार कल्पों से इस राक्षस योनि की प्रताड़ना से ऊब चुका था, अब वह अच्छा और नेक सत्कर्म करके सीधा बैकुंठ लोक के मार्ग पर जाना चाह रहा था।
जिससे इस योनि से उसे शीघ्र ही छुटकारा मिल सके इसीलिए वह अपने साथियों सहित स्वयं धार्मिक शतपथ का अनुसरण कर रहा था उसकी मुक्ति का भी समय अब निकट था। अतः वह सदैव ही नित्य प्रति अपने साथियों को न्याय आन्याय की खोज में सदा ही उस पहाड़ के चारों दिशाओं में भेजा करता था।
जब धूम्रा राक्षस ने उस भयावह सत्य को देख लिया
लेकिन आज…, आज उसे दो सप्ताह से भी अधिक समय हो चुका था उस भयावह शक्ति को खोजते हुए, जिसने उसके पहाड़ की तराई से एक घायल युवक को किसी मानव कन्या के हाथों उठवाकर उसे अदृश्य पहाड़ पर पहुँचवा दिया था।
वह कोई साधारण प्राणी नहीं था।
न वह कोई दानव था, न ही कोई राक्षस— बल्कि वह अंधकारमय शक्तियों से जुड़ा एक रहस्यमय पिशाच था।
जादू और मायावी विद्या में वह अत्यंत निपुण था। उसकी शक्ति इतनी प्रबल थी कि उसके सामने आने वाला हर विरोधी स्वयं को असहाय महसूस करने लगता था। टोनी पर्वत पर रहकर वह वर्षों से अपना प्रभाव बनाए हुए था, और अब धूम्रा राक्षस को भी उसी अज्ञात शक्ति की तलाश थी।
उसके सामने जब भी कोई शत्रु आता, तो वह अपनी मायावी शक्तियों से उसे निरीह प्राणी में बदल देता और कुछ ही दिनों में उन्हें अपने वश में कर लेता। इसी प्रकार टोनी पर्वत पर रहकर वह वर्षों से अपना प्रभाव जमाए हुए था।
लेकिन धूम्रा राक्षस को उस युवक मानव के विषय में अब भी स्पष्ट स्मरण था—जब उसके पहाड़ के निचले हिस्से में वह घायल अवस्था में गिरा था, तब समूचे राक्षस लोक को यह आभास हो गया था कि वहाँ कोई जीवित मनुष्य उपस्थित है।
तभी से धूम्रा राक्षस के सभी साथी उसकी खोज में लग गए थे।
और आज… आज धूम्रा राक्षस, अपने विशाल व्यक्तित्व, लंबे काले बालों और सघन दाढ़ी-मूँछों के साथ, अपने सभी साथियों के बीच गंभीर स्वर में गरज उठा—उसकी आवाज़ में भय नहीं, बल्कि निर्णायक संकल्प झलक रहा था।
मूर्खों, मैं अपने ज्ञान योग के मंत्रो के प्रभाव से उसे देख रहा हूं कि वह दुष्ट कहां रहता है। किंतु मुझे इस बात का अफसोस है की बिना हमारे तुम सब कोई भी कार्य अपनी पूर्ण निष्ठा से नहीं कर पाते हो...। मेरे साथियों, तुम सब यह भली भांति जानते हो कि जब भी मैं भ्रमण पर रहता हूं तो उस समय मेरे साथ धुओं का काला बादल और आंधी तूफानों का सैलाब उमड़ा रहता है।
एक दिन मैं , बिना बताएं तुम सभी को , उस टोनी पर्वत पर पर्यटन करने के लिए चला गया था, उस समय मुझे विलंब हो रहा था लेकिन मेरे नथुनों में किसी मनुष्य के होने का वहां गंध टकराया था । मेरा मन चाहा था कि मैं वहाँ रुक कर उस असहाय मनुष्य का पता लगाऊं, जो उस दुष्ट जादूगर के कब्जे में है किंतु समय के अभाव के कारण मैं ज्यादा समय तक वहां नही ठहरा ।
तत्पश्चात मंडल नाम का एक राक्षस बड़ी हिम्मत करके धूम्रा से पूछा था।
स्वामी उस दुष्ट मायावी का नाम बताइए इस समय वह कहां मिलेगा, क्या वह टोनी पर्वत पर ही है या फिर और कहीं, अपने ध्यान योग से उस दुष्ट का पता लगाएं, हम सब अभी इसी क्षण , उस स्थान पर जाएंगे जहां आप बताएंगे ,और हम सब मिलकर उसे बंदी बनाकर आपके सामने प्रस्तुत करेंगे।
वहां की सारी राक्षस भिड़े एक साथ गर्जना करती हुई अपने साथी मंडल राक्षस के विचारों पर सहमति देते हुए कोलाहल मचाने लगे धूम्रा राक्षस सभी की समवेत अखंड गर्जना सुनकर भाव विभोर हो उठा, वह सभी को शांत कराते हुए बोला।
आप सब कुछ छड़ रुकें, हम मंत्रों योग से उसका अभी पता लगते हैं
इतना कहते हुए धूम्रा अपने दोनों नेत्र मूंद कर वही बैठ जाता है तत्पश्चात कुछ क्षण बाद वह अपनी दोनों आंखें खोलते हुए बोला।
साथियों उसका नाम ब्रह्मराक्षस है वह कर्म से हीन पूर्ण नर पिचास है वह मनुष्य होकर भी मनुष्यता को कलंकित करता है, उसके संरक्षण में तमाम जीवात्माएं उसकी देखभाल करती हैं, इस समय शशिकला नाम की एक मानव कन्या और उसके साथ में एक वहीं युवक जो हमारी पहाड़ियों के नीचे तराई भू–भाग में अचेत गिर पड़ा था।
उसका नाम मानव कुल से,राघव राय है उसकी आत्मा सृष्टि लोक में भ्रमण कर रही है। राघव राय नाम के उस नवयुवक से शशिकला नाम की कन्या के साथ उसका विवाह होने वाला है किंतु अमावस्या की काली अर्ध रात्रि में विवाह होने से पहले उस राघव नाम के युवक के विरुद्ध भयानक षड्यंत्र रचा गया है, शादी तो उसका एक बहाना है ।
इसलिए मेरे साथियों... वहां जाओ, अति शीघ्र ही वहाँ जाओ, उसदुष्ट को बंदी बनाकर यहां लाओ, क्योंकि अब वहां उत्सव की तैयारियां शुरू हो गई है।
अचानक वहां समवेत अखंड गर्जना का कोलाहल मच गया।
हम तैयार हैं..., हम तैयार हैं..., हम तैयार हैं...।
सजते कमरे, धड़कते दिल और एक अनकहा सच
वहाँ सभी मानव भेष में रंग-बिरंगे परिधान पहने , चहल कदमी करते हुए नजर आ रहे थे। कहीं कहीँ ढोल ताशे और नगारें भी बज रहे थे, नाच गाने भी हो रहे थे। तो कहीं-कहीं पटाखे भी फूट रहे थे। यह उत्सव का तीसरा दिन था। सभी मस्त थे सभी अपने आप में मगन थे, किंतु वहां कोई किसी से ज्यादा बातें नहीं कर पा रहा था ।
राघव भी सज–धज कर रंग-बिरंगे लाइटों के बीच, एक कमरे में मखमली बिस्तर पर बैठा हुआ शशिकला का इंतजार कर रहा था। शशिकला उस विशाल भब्य भवन के मध्य वाले कमरे में ,सजने सवरने के लिए अनेकों युवतियों के साथ अभी-अभी कुछ समय पहले ही वहा गई थी। शशिकला एक सुंदर सी गुलाबी रंग की साड़ी पहने हुए, दर्पण के सामने श्रृंगार रत मुस्कुरा रही थी।
उसकी सेवा में सारी युवतिया उसके आगे पीछे दाएं बाएं लाल लाल रंग की चुनरी पहने हुए , आभा मय श्रृंगार में दमकती हुई किसी गीत को गाए जा रही थी । किंतु उनका गाया जा रहा गीत, शशिकला को बिल्कुल भी पसंद नही था , पसंद आये भी कैसे, जब गीत ही निर्थक हों...। फ़िर भी उनका साथ देने के लिए वह मजबूर थी, ताकि उन युवतियों को निराशा न हो । तभी उनमे से एक वृद्ध महिला , चुपके से बाहर निकलती हुई सीधा राघव के कमरे में पहुँची।
ब—बेटा, तुम यहाँ से जितनी जल्दी हो सके बाहर निकल जाओ, फिर दुबारा लौटकर यहाँ कभी भी मत आना। क्योंकि, यह स्थान तुम्हारे रहने योग्य नहीं है। यहाँ सब भूत आत्माएं रहती है। भागो...भागो। यहाँ से भाग जाओ बच्चे।
उसकी घरघराती हुई आवाज सुनकर राघव को जैसे सांप सूंघ गया, वह भय से कापते हुए बोला।
भ–भूत भूत, क–क्या। कहा.... यहाँ सभी भूत हैं। त–तुम, तुम...कौन हो। क–कहीं तुम भी तो भूत नही हो । और। म–मेरी शशि। क्या मेरी शशि भी भूत है ।
शशिकला और तुम्हारे अलावा यहां सब भूत है इसलिए यहां से शशि को लेकर तुम भाग जाओ।
राघव इससे पहले की कुछ कहता, वहां अनेकौं स्त्री आत्माएं आकर उस बुढ़िया को पकड़ कर वहां से घसीटते हुए बाहर की तरफ लेकर चली जाती है। तत्पश्चात शशिकला दौड़ती हुई राघव के पास आकर बैठ जाती हैं। और उससे कहती है, क–क्या हुआ राघवेंद्र आप बहुत घबराए हुए हैं ?
राघव अचानक खड़ा होते हुए शशि कला को अपने सीने से लगाते हुए भयभीत स्वर में बोला।
"शशि.. शशि" एक बुढ़िया अभी यहां मेरे पास आकर मूझसे बोल रही थी। की, कि मेरे और शशि तुम्हारे अलावा , यहां सब भूत प्रेत हैं। क–क्या यह सच है ।
शशिकला राघव को अपने से अलग करती हुई बड़े प्यार से समझाते हुए बोली।
यह सब झूठ है, बकवास है, वह बुढ़िया आपसे झूठ बोल रही थी, ऐसा यहाँ कुछ भी नहीं है । जरा सोचें, आप यहां हमारे बाद आए हैं, मैं यहां बचपन से रहती हूं, मुझे कुछ भी ऐसी चीज यहां देखने को नहीं मिली, जिसे मैं आश्चर्य से उसे भूत प्रेत कहूं, यदि आप भूत–प्रेत में विश्वास करते हैं तो उस बुढ़िया के विषय में हमें और पता लगाना चाहिए, कि ऐसा वह क्यों बोली। किस कारण से बोली थी।
कि तभी उन दोनों के कानों में,मर्मांतक चीखे सुनाई पड़ी, वे दोनों शीघ्र ही बाहर की तरफ लपके।
"हा, हा, हा,हा, हा, हा,हा.....!"
भवन के बाहर जोर-जोर से कोई अट्टहास कर रहा था, अट्टहास करने वाला कोई और नहीं, बल्कि वह ब्रह्मराक्षस था जो बड़ी निर्दयता से, उस बुढ़िया को डराते हुए चिल्ला रहा था।
नासमझ स्त्री, उस युवक से तुम क्या बतला रही थी, बता… नहीं तो तुझे कठोर दंड देकर तुझे सबक सिखा दूँगा, तेरा अंत निश्चित ही कर दूँगा।
वह बुढ़िया पता नही अपने किस भाषा में गिड़गिड़ा रही थी,रो रही थी, भय से काँप रही थी और रहम की भीख माँग रही थी
राघव उस बुढ़िया को देखते ही तुरंत पहचान गया और वह शशिकला को अपनी बाहों में भरते हुए धीरे से बोला। यह वही बुढ़िया है जिसने हमें बताया था कि यहां सब भूत है। तुम और शशिकला ही दो ऐसे मानव हो जो भूत नहीं हो। बाकी के सब भूत आत्माएं है यहां।
राघव और शशिकला दोनों ही उसके खूंखार हंसी से भयभीत थे..। किंतु, वह हँसे जा रहा था।
"हा हा हा हा हा हा,! हा हा हा हा हा हा हा हा....!"
हँसते-हँसते ही वह बुढ़िया को बड़ी निर्दयता के साथ डराता ही जा रहा था। बुढ़िया जोर-जोर से चिल्ला रही थी, वह भय से काँप रही थी, फिर भी उस निर्दयी व्यक्ति को लेशमात्र भी उस बुढ़िया पर दया नहीं आ रही थी, वह उसे लगातार अपमानित करता जा रहा था। राघव उस बुढ़िया की ओर देखकर-देखकर तरस खा रहा था।
शशि… शशि… तुम देख क्या रही हो, प्लीज़! उस बुढ़िया को जाकर बचा क्यों नहीं लेती, नहीं तो वह तेरा बाबा उसे बहुत बड़ा नुकसान पहुँचा देगा। देखो ना, वह बेचारी कैसे डर से काँप रही है। वह हमारी ही तरफ देख रही है, उसे जाकर बचाओ प्लीज़।तुम्हारे बाबा कितनी बेरहमी से उसे धमका रहे हैं, और तुम… तुम यहाँ खड़ी-खड़ी बस उसका मुँह देखे जा रही हो।
क्या तुम्हें उस पर दया नहीं आती।
राघव की याचना को नजरअंदाज करते हुए शशिकला ने कहां।
राघवेंद्र, अभी वहाँ जाना उचित नहीं है। यदि यहाँ सब भूत हैं और बाबा हमारे भूत हैं, तो हमें यहीं से देखना होगा कि एक भूत दूसरे भूत के साथ कैसा व्यवहार करता है।प्लीज़, अभी शांत रहो। हम यहीं से उस भूत का पता लगाना चाहेंगे,
जिसके विषय में वह डरी हुई बुढ़िया आपको बता रही थी।
यदि हम ज़रा-सी भी जल्दबाज़ी करेंगे, तो वह भूत सतर्क हो जाएगा और हम उसके बारे में कोई जानकारी नहीं ले पाएँगे।
इसलिए अभी चुपचाप, शांत खड़े रहना ही ठीक होगा।
आगे क्या होता है, हमें यहीं से देखना है।
राघव ने शशिकला की बात बड़े ध्यान से सुनकर चुपके से बोला।
शशि, आप बहुत ही बुद्धिमान हो, ठीक है हम दोनों यही से छुप कर देखते हैं । राघव और शशिकला दोनों बड़े होशियारी से एक ऊंचे टीले के नीचे शांत होकर चुपचाप बैठ जाते हैं । तभी उन दोनों के कानों में ब्रह्मराक्षस की भयानक गर्जना सुनाई पड़ी।
हा हा हा हा हा हा हा..!" क्यों रे दुष्ट आत्मा तुमने क्या समझ रखा है की जो कुछ भी तो करेगी या किसी से कुछ कहेगी मुझे उसकी खबर तक नहीं लगेगी। "हा हा हा हा हा हा हा हा...!
"चाबुक से डराते हुए...!" तेरी भूतनी की ये ले, अब मैं तुझे क्या बनाता हूँ देख।
ओम मायाए नमः, ओम मायाए नमः, ओम मायाए नमः…ओम भेड़ भेड़ भेड़ स्वाहा…
देखते ही देखते वह बुढ़िया भूतनी भेड़ के रूप में बदल गई —
अद्भुत, आश्चर्यजनक और अविस्मरणीय दृश्य था वह।
ब्रह्मराक्षस बड़ी तेजी के साथ हँसा —"हा हा हा हा हा हा हा हा…!" क्रोध में उसका चेहरा तम–तमाया हुआ था,
उसकी दोनों आँखों में भयानक चमक थी। वह म्यान से तलवार निकालते हुए दहाड़ा —"हा हा हा हा! हा हा हा हा हा हा हा…"
"अब इसी क्षण इस मूर्ख आत्मा को उसके कर्मों का परिणाम मिलेगा!"
वह भेड़ के निकट पहुँचा, मंत्रों का जाप करता हुआ…
और फिर —वह दृश्य इतना डरावना था कि किसी की आँखें उसे सह न सकीं। उसके बाद वह तेज गर्जना के साथ चिल्लाया —"तुम सब कान खोल कर सुन लो। यदि मेरे साथ किसी ने भी किसी भी प्रकार की चालाकी की या धोखा देने की कोशिश की — तो उसका अंत भी ऐसा ही होगा!"
उस टीले की ओट में छिपे हुए राघव और शशिकला के होश उड़ गये। राघव ने शशिकला के कान मे धीरे से बोला। शशि देख रही हो, यह भूत है या मानव। देख लो, तुम कहती थी न की, यहाँ कोई भूत नही है, मै कहता हूँ यहाँ कोई भूत हो या न हो किंतु तुम्हारे बाबा अवस्य भूत है। इसलिए अब हमें यहाँ..., एक पल भी नहीं रुकना चाहिए, चलो यहाँ से।
डर के मारे राघव का सारा शरीर पसीने पसीने हो गया था, न—नहीं, हम यहाँ से कहीं नहीं जा सकते,"शशिकला ने कहा" ।
चूंकि यहाँ चारों तरफ से, बाबा की सहेजी हुई आत्माये, एक एक आत्माओं की पहरेदारी कर रही हैं, आप भूल कैसे गए, हम सभी को बचाने के लिए वह बुढ़िया, हमारे दुष्ट बाबा के हाथों भयानक अंजाम का शिकार हो गई थी। इसलिए हे राघवेंद्र,,। हमें यहां से निकलने के लिए खुब सोच समझकर निर्णय लेना चाहिए, अभी बाबा क्या कह रहे है, उसे ध्यान से सुनो...।
किंतु..., राघव ने शशिकला से कहा, तुम उसे अभी तक बाबा बाबा क्यों कह रही हो, यह जानते हुए भी कि वह राक्षस है ।
प्लीज राघवेंद्र अभी शांत रहो उसके विषय में ऐसे उल्टा सीधा मत बोलो और न हीं उल्टा समझो,"शशिकला समझाते हुए राघव से बोली"।
क्योंकि वह मन की सारी बातें जान जाता है इसलिए शांत होकर उसकी बातें सुनो , प्लीज इसके आगे अब कुछ भी मत बोलो सिर्फ उसकी बात सुनो बात...।
ठीक है आप कहती हो तो मैं कुछ भी नहीं बोलूंगा । राघव शांत हो गया। उधर वह ब्रह्मराक्षस अपने कड़े लहजे में, उन ढेर सारी आत्माओं को सख्त चेतावनी देते हुए ललकारा..।
यदि उस बूढ़ी आत्मा जैसी गलतियां फिर किसी ने दोहराने की जुर्रत की तो समझो, उसका अंजाम बहुत ही भयानक होगा, बहुत कठोर सजा मिलेगी "हा हा हा हा हा हा हा हा हा हा हा... " और साथ ही साथ मेरे दुश्मन भी ध्यान से सुन ले। जो अभी – अभी कुछ समय पहले ही हमारे इस पहाड़ पर पधारे हैं उनसे हमारी कोई दुश्मनी नहीं है।
वे चुपचाप यहां से चले जाए, अन्यथा उनके लिए भी परिणाम बहुत ही कठिन हो सकता है। इसलिए जैसे भी आप सब यहां आए है, वैसे ही सम्मान पूर्वक यहा से चले जाये। हम आप सबको वचन देते हैं कि आप सबको किसी भी प्रकार की हानि नहीं पहुंचाई जाएगी ।
तभी एक भयानक गर्जना उसकी आवाज को दबाती हुई गुर्रा उठी।
अरे दुष्ट आत्मा, चुप हो जा! तुम कोई महान शक्ति नहीं,
बल्कि अंधे रास्ते पर भटका हुआ प्राणी हो। मनुष्यों को पीड़ा देने वाला —अब तेरे कर्मों का समय आ चुका है। सावधान हो जा…!
इतना कहते ही कई राक्षस हवा के झोंकों की तरह उसकी तरफ बढ़ चले..., तभी वह गुर्राते हुए बड़ी तेजी के साथ अट्टहास करने लगा।
हा हा हा हा हा हा हा हा…! अरे मूर्खो, अपने ही विनाश की ओर क्यों दौड़ रहे हो? मैं कोई बच्चों का खिलौना नहीं,
जिसे छूकर खेल लिया जाए। आओ… आओ… अब देखो कैसे मज़ा आता है!
तभी अनेकों शैतान अपने-अपने हाथों में चमकती हुई शक्तियों के साथ, हवा में उड़ते हुए ब्रह्मराक्षस की ओर बढ़े। उधर ब्रह्मराक्षस भी आकाश में उठ खड़ा हुआ, और अद्भुत कौशल के साथ उनका सामना करने लगा। क्षण भर में आकाश में ही
आश्चर्यजनक दृश्य रचने लगा — बिजली सी तेज़ गतियाँ,
गूंजती हुंकारें और रहस्यमयी शक्तियों का टकराव…
राघव-शशिकला ने देखा भयानक युद्ध
देखते ही देखते वहाँ भयानक संघर्ष का माहौल बन गया। एक ब्रह्मराक्षस के स्थान पर सैकड़ों ब्रह्मराक्षस अपने-अपने रहस्यमयी रूपों में प्रकट होते दिखाई देने लगे। उनके बीच शक्तियों का ऐसा टकराव हो रहा था कि आकाश में चमकती रोशनियाँ फैल गईं। राघव और शशिकला यह सब देख-देख कर घबरा गए।
किंतु जब वह ब्रह्मराक्षस निरंतर संघर्ष करते-करते थकने लगा,
तो वह अचानक दृश्य से ओझल हो गया और दूर कहीं से उसका अदृश्य अट्टहास गूंजने लगा। अब वहाँ मौजूद सभी राक्षस, आकाश में चारों ओर उसे घबराकर खोजने लगे। काफी समय तक उसका कोई पता नहीं चला।
तब वे सब व्याकुल होकर ऊँची आवाज़ों में उसे पुकारने लगे।
तभी वह अचानक बादलों की भाँति गरजते हुए प्रकट हुआ।
उसके साथ उसी के समान अनेक रूप फिर से हवा में तैरते हुए दिखाई देने लगे।
तत्पश्चात दूर से ही वह मंत्रोच्चारण करने लगा।
देखते ही देखते एक विचित्र दृश्य बना —कई राक्षस अपने ही रूप से बदलते हुए, भेड़-बकरी और सूअर जैसे आकार लेने लगे। वे सब धीरे-धीरे पहाड़ की ओर उतरते चले गए, और वहाँ उनकी आवाज़ें गूंजने लगीं। ब्रह्मराक्षस ने गरज कर अट्टहास किया —“हा… हा… हा…!”
इसके तुरंत बाद ही वह मोहनी मंत्र का प्रयोग करते हुए राघव शशिकला को भी अपने नजदीक बुलाकर उत्सव की तैयारी के विषय में महत्वपूर्ण बातों का इशारा करते हुए गायब हो गया।
सबसे बड़ा भय – भय का भय है। जो इससे मुक्त हो गया, वह मृत्यु से भी मुक्त हो गया। बुद्ध ने कहा कि "जो देखा नहीं, अनुभव नहीं किया, उस पर विश्वास मत करो।
तो दोस्तों... देखा आपने, कैसे ब्रह्मराक्षस ने पूरे युद्ध का रुख पलट दिया। राक्षसों को जानवर बना डाला, और अब राघव–शशिकला पर है उसका अगला निशाना,"पर क्या वो बच पाएंगे?"
तो दोस्तों... देखा आपने, कैसे ब्रह्मराक्षस ने पूरे युद्ध का रुख पलट दिया। राक्षसों को जानवर बना डाला, और अब राघव–शशिकला पर है उसका अगला निशाना,"पर क्या वो बच पाएंगे?"
जुड़े रहिए — Kedar ki kalam (www.kedarkahani.in) के हिंदी उपन्यासों की रोमांचकारी दुनिया में। अपने रिश्तेदारों, मित्रों, और आसपास के हर कहानी-प्रेमी को इस ब्लॉग के बारे में जरूर बताइए
क्योंकि ऐसा रहस्य, ऐसा सस्पेंस — सिर्फ kedar ki kalam ही ला सकते हैं।
क्योंकि ऐसा रहस्य, ऐसा सस्पेंस — सिर्फ kedar ki kalam ही ला सकते हैं।
यह कहानी पूर्णतः काल्पनिक है, इसका उद्देश्य केवल साहित्यिक मनोरंजन और मानवीय भावनाओं को प्रस्तुत करना है।
लेखक: नागेन्द्र बहादुर भारतीय, केदार नाथ भारतीय
ब्लॉगर | कहानीकार
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