क्या वह राजमहल सच था या टूटी हुई जिंदगी का एक सपना? उसने बताया कि एक सप्ताह पहले यहां मेरी तीन बकरियां गुम हो गई थी, एक मिली और दो अभी नहीं मिल सकी है उन्हीं को ढूंढते–ढूंढते मैं यहां पहुंचा था, दूर से जब मैंने आपको देखा तो मुझे लगा कि शायद आप ही बकरियां चोर हैं आपके पास आया तो आप गहरी नींद में सो रहे थे, मैंने आपको उठाने का प्रयास किया तो आप उठे, किंतु आपने रामचंद्रन पंढरपुरी के विषय में जो कुछ भी हमें बताएं उसे सुनकर हमें भी गहरा सदमा पहुंचा है, हम भी भयभीत हो उठे हैं । यह कहानी केवल शब्दों का क्रम नहीं, बल्कि उन रिश्तों की गूंज है...आइए, इस दुर्गम पथ पर राम मनोहर के साथ चलें और दोस्ती के उस अर्थ को समझें जो हर मोड़ पर खुद को साबित करता है। लेखक: केदार नाथ भारतीय उर्फ भुवाल भारतीय, उत्तर प्रदेश, प्रयागराज
तुम जानती हो यह कौन है? यह एक साधारण मानव है — हाड़–मांस का इंसान।
और तुम… एक ऐसी शक्ति से जुड़ी हो, जिसकी दुनिया उससे बिल्कुल अलग है।
"विचित्र दुनिया" सिर्फ एक "उपन्यास" कहानी नहीं है ! ये एक अनुभव है, जो आपको अंदर तक हिला कर रख सकती हैं। पिछले भागों में आपने देखा कि को— राघव एक फाइव स्टार होटल में आराम कर रहा था, तभी गांव में भूकंप की खबर उसे बेचैन कर देती है। वह फौरन निकल पड़ता है, लेकिन जैसे ही बस से उतरता है — बस रहस्यमयी ढंग से गायब हो जाती है, गांव की तलाश में राघव दर - दर भटकता है पर हर चीज़ अजीब और अनजानी लगती है।
अचानक गिद्ध राघव को उठा ले जाते हैं, लेकिन आपस में लड़ते हुए उसे गिरा देते हैं। वह गिरता है... ऐसी जगह जहाँ कोई इंसान या जानवर नहीं पहुंच सकता।
जब होश आता है, राघव खुद को एक बदबूदार झोपड़ी में पाता है। तभी एक सुंदर लड़की आती है और देखते ही देखते वह झोपड़ी एक महल में बदल जाती है। उसका नाम है — शशिकला था। वह राघव से प्रेम का इज़हार करती है। राघव सोच में पड़ जाता है, फिर भी… वह "हाँ" कह देता है।
अब सवाल ये है — क्या राघव और शशिकला की शादी होगी या यह एक और धोखे की शुरुआत है अब आगे...
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| एक साधारण मानव और असाधारण शक्तियों की दुनिया के बीच में राघव… |
भव्य मकान और राघव का बढ़ता भय—विचित्र दुनिया
मकान की बाहरी डिजाइन सर्वश्रेष्ठ थी – संतुलित आकार, आकर्षक डिजाइन, सुंदर दरवाजे और खिड़कियां, पेड़-पौधों की हरियालियां एवं आउटडोर लाइटिंग देखने में बेहद सुंदर लग रही थीं।
मकान के अंदर आरामदायक फर्नीचर एवं सुंदर दीवारों पर नंबर एक की डिजाइन, पक्की फर्श तथा दरवाजे पर रंगीन परदे लगे हुए थे। संपूर्ण मकान इत्रों की खुशबुओं से सुगंधित था।
शशिकला राघव के कंधों पर और राघव शशिकला की कंधों पर हाथ रखकर दोनों हँसते-खिलखिलाते हुए ठीक मकान के सामने आकर रुक जाते हैं।
राघव मकान की भव्यता देखकर घबरा जाता है। वह शशिकला के हाथों को अपने कंधों से हटाते हुए भयभीत शब्दों में चिल्लाया – "अरे–अरे ये क्या! इतना बड़ा मकान? बाप रे! ऐसा मकान तो पहले यहां दूर-दूर तक कहीं भी नहीं था। ये... ये अचानक इतना बड़ा मकान!"
शशि–शशि… म–मुझे बताओ, मुझे बताओ कि… कि ये मकान किसका है?
किसका है ये मकान? इतना बड़ा मकान!
म–मुझे बताओ शशि, न–नहीं तो आश्चर्य से मेरे प्राण निकल जाएंगे…
इतना कहकर वह पसीने–पसीने हो गया।
आँखों के सामने अँधेरा छाने लगा और वह लड़खड़ाकर ज़मीन पर गिरने ही वाला था।
उसी क्षण शशिकला ने आगे बढ़कर उसे सँभाल लिया।
उसने बड़े स्नेह और अपनत्व के साथ राघव को सहारा दिया
और धीरे–धीरे उसे अपने नए मकान के शांत, वातानुकूल कमरे तक ले गई।
वह मखमली बिस्तर पर राघव को लिटाकर, अपने आँचल से जल्दी-जल्दी राघव के चेहरे पर आए हुए पसीने को पोंछने लगी। साथ ही साथ, उसके मस्तक पर शीतल जल का छिड़काव करते हुए वह रोने लगी – "न–नहीं... नहीं! मेरे शिरोमणि, म–मैं आपको कुछ भी नहीं होने दूंगी।
भले ही आप एक मनुष्य के रूप में हैं, एक मानव शरीर में हैं, किंतु आप मुझे ऐसे ही जीवन भर अच्छे लगेंगे। मैं आपको अब कहीं भी जाने नहीं दूंगी। सदा ही मैं आपके साथ रहूंगी, और न ही मैं आपसे अपना परिचय छुपाऊंगी, और न ही अपना लोक छिपाऊंगी।"
"हे राघवेंद्र, हे मेरे प्रीतम! मैं आपका साथ निभाऊंगी, भले ही मैं एक आत्मा हूं। आप जैसा मनुष्य तन मेरे पास नहीं है, किंतु मैं आपका साथ जीवन पर्यंत नहीं छोड़ूंगी। इसके लिए चाहे मेरे बाबा ब्रह्मराक्षस जी मुझे जो भी दंड दें – हम उसे सहर्ष स्वीकार करूंगी।"
काली अमावस्या की रात और अंतिम आदेश
कि_ तभी एक भयानक अट्टहास – "ही... ही... ही... हीं! हुँ... हूँ... हुँ! हा... हा... हा...!"
"बाबा, आप!" शशिकला अपने बाबा ब्रह्मराक्षस का अचानक आगमन देखकर सकपका सी गई। वह सहमते हुए विनम्र भाव में बोली – "ब–बाबा... बाबा, आप! किसी से संदेश भिजवा दिए होते, तो मैं स्वयं ही आपके पास चली आती। आखिर यहाँ अकस्मात आने का क्या कारण है?"
“हा… हा… हा…!” वह ठंडी हँसी के साथ बोला —“मूर्ख लड़की! मेरे आने का कारण पूछती है? मेरे आने का कारण है — इस लड़के के प्रति तेरी दीवानगी, तेरी बेसुमार चाहतें और तेरी प्यार भरी उल्फ़तें, समझी?”
“तुम जानती हो यह कौन है? यह एक साधारण मानव है — हाड़–मांस का इंसान।
और तुम… एक ऐसी शक्ति से जुड़ी हो, जिसकी दुनिया उससे बिल्कुल अलग है।
तुम दोनों का मिलन आसान नहीं है।”
“फिर भी तुम्हारी मोहब्बत देखकर हमने यह रिश्ता तय किया है…, लेकिन इससे पहले कि यह संभव हो,इसे एक बहुत बड़ी परीक्षा से गुजरना होगा। एक ऐसा कठिन रास्ता, जहाँ साहस और सहनशक्ति ही इसका सहारा बनेगी।”
वह धीमी मगर डरावनी हँसी हँसते हुए बोला — “आने वाली काली अमावस्या की अर्धरात्रि…, उस रात सब कुछ तय हो जाएगा। उस दिन एक ऐसा निर्णय होगा, जो हम सबकी किस्मत बदल देगा।” “हमारी बिरादरी को बहुत समय से एक बड़े अवसर की प्रतीक्षा थी। उस रात एक भव्य आयोजन होगा — ढोल–नगाड़ों की गूंज होगी,और हर कोई उस निर्णायक पल का साक्षी बनेगा।”
धूम्रा राक्षस का साया और राघव पर पहला अधिकार
तभी अकस्मात उसके चेहरे का रंग उड़ गया। वह भय से थर–थर काँपने लगा। उसकी गर्जना, उसका अट्टहास, एकाएक खामोश हो गया। अब वह पूरी तरह से शांत था। उसके चेहरे पर मलिनता के धुंध छा गए थे, जैसे कि वह श्मशान घाट से पैदल चलकर मुँह लटकाए वहीं आकर ठहर गया हो।
वह सौंदर्य की प्रतिमूर्ति बनी शशिकला, अचानक अपने बाबा के चेहरे का उड़ा हुआ रंग देखकर घबरा जाती है। इससे पहले कि वह कुछ बोलती, उसके बाबा ब्रह्मराक्षस जी, बड़े ही मद्धिम आवाज में, घबराए हुए स्वर में बोल पड़े –
"बेटी शशि, वह धूम्रा राक्षस हमारा पीछा कर रहा है। जानती हो वह कौन है? वह पांड्या पहाड़ का मालिक – अति बलशाली, तेजस्वी और बुद्धिमान है। जब तुमने उस नवयुवक को, जो पहाड़ों की तराई में गिरा हुआ बेसुध अवस्था में मरणासन्न था, उसको उठाकर अपने इस राजमहल में लेकर आई थी – सच पूछो तो उस नवयुवक पर प्रथम अधिकार धूम्रा राक्षस का ही था। किंतु तुमने उसे उठाकर जो यहाँ तक लाई – वह सबसे बड़ी भूल थी तुम्हारी।"
"अब वह धूम्रा राक्षस तुम दोनों को ढूँढ़ रहा है, लेकिन वह यहाँ तक तो नहीं पहुँच सकता। किंतु तुम दोनों को सावधानीपूर्वक इसी गुप्त कमरे में रहना है – तब तक के लिए, जब तक कि तुम दोनों की शादी नहीं हो जाती। और हाँ, ये भी याद रखना – यदि तुम दोनों भूल से भी उसके हाथ लग गए, तो समझो सब कुछ समाप्त हो जाएगा। अब मैं चलता हूँ अपने साथी–संघ के पास, अपना ख्याल रखना।"
"बाबा – बाबा... बाबा!" शशिकला चिल्लाई! किंतु वह अंतर्ध्यान हो गया। शशिकला शायद उससे कुछ कहना चाहती थी, लेकिन इसके पहले ही वह गायब हो गया।
राघव को अभी होश आने में देरी थी। इसके पहले कि उसकी तंद्रा भंग हो, शशिकला ने सोचा कि मैं तब तक अच्छा सा भोजन राघवेंद्र के लिए बना दूँ। वह रसोईघर में तत्काल भोजन बनाने के लिए चली गई।
रसोईघर की ओर बढ़ते कदम
राघव, इधर बेहोशी की हालत में बिस्तर पर पड़ा खर्राटे भर रहा था। अभी शशिकला को चंद मिनट भी नहीं हुए थे रसोईघर में गए, कि राघव को होश आ गया। वह इधर–उधर निहारता रहा, फिर बिस्तर से उठकर शशिकला को खोजने लगा। खोजते–खोजते वह उसी रसोई की तरफ चला गया जहाँ पर शशिकला पहले से ही थी।
किंतु वहाँ पहुँचने पर राघव ने जो कुछ देखा, देखते ही उसकी आँखें फटी की फटी रह गईं, और वह वहीं... बड़ी तेजी के साथ चिल्लाते हुए, पुनः पक्की फर्श पर गिरकर बेहोश हो गया।
राघव की चीख सुनकर शशिकला बदहवास सी दौड़ पड़ी। वह पक्की फर्श पर पड़े हुए राघव को देखकर अपना आपा खो बैठी थी।
वह जोर–जोर से रोते हुए राघव को अपने सीने से लगा ली। बिन जल मछली भाँति तड़पती हुई, राघव को मखमली बिस्तर की ओर लेकर भागी, जिस बिस्तर को राघव ने अभी–अभी कुछ समय पहले ही छोड़ा था।
वह राघव को नरम गद्देदार बिछौने पर ले आकर, अपनी गोदी में उसका सिर रखकर, बैठे–बैठे वहीं करूण क्रंदन करने लगी।
वह सोच रही थी कि — “मेरा राघवेंद्र एक मासूम मनुष्य है, और मैं… मैं एक अलग ही लोक से जुड़ी हूँ। मैं तो सब कुछ सह लूँगी, किंतु मेरा यह राघवेंद्र…,मेरा यह प्रियदर्शन, इतनी भयावह परिस्थितियाँ शायद सह न सके।”
वह रोते हुए स्वयं से ही कह रही थी।“मुझसे कितनी बड़ी भूल हो गई जो अपने प्रेम को अकेला छोड़कर रसोईघर में चली गई।
मेरे बाबा ने हमारी सुरक्षा के लिए कुछ रहस्यमयी प्रहरी यहाँ छोड़े थे…, जिनका रूप इतना डरावना है कि कोई भी साधारण मनुष्य उन्हें देखकर सहम जाए।”
मुझे क्या पता था कि राघव इतनी जल्दी होश में आकर
वहाँ पहुँच जाएगा। उसी भयावह दृश्य ने मेरे साजन को इस कदर डरा दिया कि वह स्वयं को संभाल नहीं सका। अगर मैं ऐसे ही उसके साथ व्यवहार करती रही, तो कहीं वह किसी बड़े संकट का शिकार न हो जाए…।
नहीं…, नहीं…, अब मैं ऐसी गलती फिर कभी नहीं करूँगी।”
“पता नहीं…, मेरा राघवेंद्र अपनी दुनिया में किन-किन रिश्तों से जुड़ा होगा। । वह किसी का इंतज़ार हो सकता है, या फिर किसी का दुलारा हो सकता है, किसी के सावन माह में पड़ने वाली राखी का त्योहार हो सकता है।"
नजरों में अटका जवाब
कुछ भी हो, किंतु मेरा राजा तो मेरे लिए सबसे अधिक प्रिय है…, अनमोल है।
मैं इनके लिए वह सब कुछ सह लूंगी… जो एक राक्षस जाति के लिए भी असंभव है।
अब तो मेरी यह रूह, इनके ही जीवन से हमेशा–हमेशा के लिए जुड़ी रहेगी।
शशिकला सोचते–सोचते भावनाओं में बह गई।
उसी क्षण राघव की तंद्रा भंग हो गई।
धीरे–धीरे राघव ने अपनी दोनों आँखें खोलीं…, सामने शशिकला को देखते ही वह चौंका — “अरे… शशि—शशि! आप…?!” वह दर्द से कराह रहा था — “शशि… मेरा सिर बहुत दर्द कर रहा है…, ऐसा करो, तुम ज़रा मेरा ध्यान रखो… प्लीज़…” सुनते ही शशिकला घबरा गई। वह तत्क्षण राघव का सिर अपनी गोद में लेकर अपने कोमल हाथों से उसे सहलाने लगी।
राघव अब पहले की सारी घटनाएँ भूल चुका था और शशिकला के कोमल हाथों के स्पर्श से धीरे–धीरे भावनाओं में डूबता चला गया।
अचानक उसने शशिकला के हाथों को अपने हाथों में लिया और भावुक होकर मुस्कराते हुए बोला —“शशि… शशि… आप मुझे बहुत ही सुंदर लगती हैं, बहुत ही अच्छी लगती हैं। क्या आप मुझसे विवाह करेंगी? हम आपके बिना अब एक पल भी नहीं रह सकते… और न ही एक पल के लिए आपसे दूर होना चाहते हैं…”
वह शांत स्वर में बोलता चला गया —“प्लीज़… मुझे जल्दी बताइए… क्या आप मुझसे प्रेम करती हैं? यदि करती हैं, तो मुझसे कितना…? क्या उतना ही, जितना मैं आपसे करता हूँ…? तो बताइए शशि…” राघव का यह सच्चा भाव सुनकर शशिकला ठिठक सी गई…, और उसे उसी नज़र से देखने लगी, जिसकी उसे बहुत समय से प्रतीक्षा थी।
कुछ पल मौन रहकर वह धीरे से बोली —“राघवेंद्र… आपने ऐसा पहले कभी नहीं कहा… मैं भी आपसे उतना ही प्रेम करती हूँ… किंतु…” इतना कहते ही वह रुक गई। उसकी चुप्पी देखकर राघव व्याकुल हो उठा — “किंतु…? क्या हुआ शशि? क्या मैं आपको अच्छा नहीं लगता? क्या मुझे आपसे प्रेम करने का अधिकार नहीं…? आपकी खामोशी से मेरा मन बहुत घबरा रहा है…”
“मैं कितना अभागा हूँ शशि… जो चाहता हूँ, वह हमेशा अधूरा ही रह जाता है…” शशिकला उसकी भावनाएँ देखकर भीतर ही भीतर विचलित हो उठी। वह सच बताना चाहती थी, पर डर भी रही थी।
वह सोचने लगी — “यदि मैं सब सच कह दूँ, तो मेरा राघवेंद्र कहीं फिर से घबरा न जाए…” “बताऊँ… या न बताऊँ…” इसी उधेड़बुन में वह राघव की आँखों में झाँकती रही।
शशिकला की चुप्पी अब राघव को बहुत भारी लगने लगी। वह गहरी साँस लेकर बोला —“ठीक है… यदि आप मुझसे प्रेम नहीं करतीं तो भी कोई बात नहीं… पर मैं तो करता हूँ…”
“शशि… मुझे क्षमा कर देना… मैं भावनाओं में बह जाता हूँ। मेरी स्मृतियाँ जैसे खो गई हैं… जो कुछ याद है, वह बस तुम हो… तुम्हारे सिवा कोई नहीं…” कहते–कहते उसकी आँखें नम हो गईं। उसके शब्द शशिकला के हृदय को छू रहे थे। अब वह और नहीं रोक सकी।
धीरे–धीरे वह बोली —“मेरे प्रिय… जो आप चाहते हैं, वही मैं भी चाहती हूँ। लेकिन मैं कौन हूँ और आप कौन हैं… इसमें बहुत अंतर है।” “आप एक मनुष्य हैं… और मैं… मैं एक ऐसी आत्मिक शक्ति से जुड़ी हूँ, जिसकी दुनिया अलग है। हमारा साथ आसान नहीं…” “आप जीवन से भरे हैं… और मैं… एक अलग ही अस्तित्व से। इसलिए जो सच था, वह बताना पड़ा…” कहते–कहते उसकी आँखें भर आईं।
शशिकला को रोते देख राघव भावुक हो उठा —“शशि, यह बात तो मुझे उसी दिन समझ आ गई थी, जब मेरी आँखें उस पुराने कमरे में खुली थीं। तभी से मैंने आपमें कुछ अलग देखा है…” “मैं जान गया था कि यह साधारण संसार नहीं है… और अब मुझे इससे कोई भय नहीं लगता।”
बस इतना बताइए… क्या आप इसी रूप में मेरे साथ रह सकती हैं…? यदि हाँ, तो यह मेरा सौभाग्य होगा कि मैं अपना जीवन आपके साथ बिता सकूँ।
शशिकला ने दृढ़ स्वर में कहा — मैं वचन देती हूँ कि मैं आपके साथ इसी रूप में रहूँगी… आपकी सच्ची जीवन–संगिनी बनकर। हर संभव पल आपके साथ बिताऊँगी। और यदि कभी मेरे कारण आपको दुख पहुँचा… तो मैं स्वयं दूर चली जाऊँगी… क्योंकि मैं आपका दुःख नहीं देख सकती।
धुंध, तूफ़ान और धूम्रा राक्षस की आहट
कि तभी वहाँ अचानक धुंध सा छाने लगा। साथ ही साथ उदंड आँधियाँ भी कौतूहल मचाने लगी थीं। देखते ही देखते वह छोटी सी अधिया अब एक तूफ़ान का रूप धारण करने लगी थी। अब वहाँ पूर्ण अंधेरा था।
ऐसी स्थिति को देखकर शशिकला घबराई। उसे समझने में एक पल की भी देरी नहीं लगी। वह समझ गई थी कि यह वही धूम्रा राक्षस है, जिसके विषय में बाबा ने हमें एक–एक आखर बड़े जतन से सहेज कर बताया था।
इसके पहले कि राघव कुछ समझ पाता, वह बड़ी चतुराई से राघव को अपनी बाहों में समेटते हुए चुराकर... बड़ी तेजी से अपनी सांसों को नियंत्रित करती हुई वहीं दुबक कर बैठ गई।
Kedar ki Kalam (www.kedarkahani.in) प्रस्तुत करते हैं एक रहस्यमयी सफ़र…अगले भाग में जानिए — धूम्रा राक्षस का असली रहस्य क्या है?
बुद्ध ने कहा है — "अविद्या परमं मलम्" – अज्ञान ही सबसे बड़ा कलंक है। जब तक मनुष्य अज्ञान के धुएँ से घिरा रहेगा, तब तक वह सही और गलत का भेद नहीं कर सकेगा।
यह बुद्ध का विचार "वर्तमान में जीने" की गहरी शिक्षा देता है।
यह कहानी पूर्णतः काल्पनिक है, इसका उद्देश्य केवल साहित्यिक मनोरंजन और मानवीय भावनाओं को प्रस्तुत करना है।
लेखक: केदार नाथ भारतीय उर्फ भुवाल भारतीय (प्रयागराज)
ब्लॉगर | कहानीकार
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