जिस दृश्य में तुमने जन्म लिया, वह दृश्य न आए दोबारा । जिस दृश्य में शैशव काल बिता, वह दृश्य न आए दोबारा ।। जिस दृश्य में मां का दूध पिया, वह दृश्य न आये दोबारा । जिस दृश्य में जननी लोरी गाई, वह दृश्य न आये दोबारा ।। जिस दृश्य में बचपन बीत गया, वह दृश्य न आए दोबारा । जिस दृश्य में पाया गुरु से शिक्षा, वह दृश्य न आए दोबारा ।। जिस दृश्य में परिणय बंधन तेरा, वह दृश्य न आए दोबारा । जिस दृश्य में बन गए मातु पिता, वह दृश्य न आए दोबारा ।। जिस दृश्य में हो गये दादा दादी, वह दृश्य...
“अरे! ये क्या…? पूरी चाय का रंग बदल गया था ।” वह घबरा कर बोला — “नहीं… नहीं… ऐसा नहीं हो सकता। ये चाय… ये चाय कुछ ठीक नहीं लग रही… म… मैं ये नहीं पी सकता… बिल्कुल नहीं।” यह कहानी पूरी तरह काल्पनिक है, लेकिन इसके हर शब्द में एक सच्चाई की झलक छुपी है। आप जिस कहानी को पढ़ रहे हैं, उसके लेखक हैं — केदारनाथ भारतीय, प्रयागराज (उत्तर प्रदेश) से।